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विद्या स्टोक्स राजनीति से सन्यास को राजी, वीरभद्र बनें उत्तराधिकारी, CM ठियोग से लड़ें चुनाव

शिमला

9 दशक पूर्ण करने के कगार पर पहुंच चुकी हिमाचल प्रदेश की सबसे वरिष्ठ नेत्री विद्या स्टोक्स अब राजनीति से सन्यास लेने के लिए तैयार हो गई है।

उन्होंने अपने ठियोग-कुमारसेन क्षेत्र से सीएम वीरभद्र सिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाने की पेशकश कर दी है।

वो खुद अब आराम करना चाहती है साथ ही पार्टी के लिए कार्य भी।

आईपीएच मंत्री विद्या स्टोक्स ने कांग्रेस हाईकमान से वीरभद्र सिंह के ठियोग विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की खुलकर पैरवी की है।

इस बाबत उन्होंने आज हाईकमान को पत्र लिखकर कहा है कि सीएम ठियोग विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के बेहतर प्रत्याशी हो सकते हैं।

वहीं, इससे पहले भी कयास लगाए जा रहे थे कि सीएम वीरभद्र सिंह ठियोग से चुनाव लड़ सकते हैं।

ऐसे में अब स्टोक्स का खुलकर सामने आना इस बात की तस्दीक करता है। विद्या स्टोक्स ने कहा कि वो संन्यास नहीं ले रही हैं।

उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिख कहा है कि अगर वीरभद्र सिंह ठियोग से लड़ते हैं तो इससे पार्टी को बहुत फायदा होगा।

वहीं, उन्होंने बताया कि वो खुद दो दिन बाद दिल्ली जा रही हैं और वहां पर सोनिया गांधी से मुलाकात इस बारे में चर्चा करेंगे।

उन्होंने कहा कि वो समाजसेवा भी करेंगी और राजनीति भी। जब उनसे पत्रकारों ने इस बात को लेकर सवाल किया कि क्या वो ठियोग विस क्षेत्र में प्रचार के लिए जाएंगे तो उन्होंने कहा कि वह ठियोग तो क्या पूरे प्रदेश में प्रचार करेंगी।

स्टोक्स ने दो दिन पहले भी होलीलॉज में सीएम से इस बाबत की थी चर्चा

इससे पहले भी विद्या स्टोक्स ने इस बाबद दो दिन पहले सीएम वीरभद्र सिंह के निजी आवास होलीलॉज में मुलाकात की थी।

उन्होंने सीएम वीरभद्र सिंह को पत्र दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि आप ठियोग विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ें। उन्होंने बताया था कि उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है।

गौर हो कि स्टोक्स ने इससे पहले भी कांग्रेस हाईकमान से आग्रह किया था कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का चेहरा वीरभद्र सिंह ही हों और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए।

एक बयान में उन्होंने कहा था कि वीरभद्र सिंह का हिमाचल की राजनीति में कोई भी विकल्प नहीं है।

इस संबंध में उन्होंने हाईकमान को लिखा था है कि वर्ष 2012 में प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान जब कांग्रेस पार्टी संकट में थी तो उन्होंने ही कांग्रेस हाईकमान को सुझाव दिया था कि वीरभद्र सिंह को चुनाव की कमान सौंपी जाए, जिसका नतीजा यह निकला कि पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार के बावजूद प्रदेश में वीरभद्र सिंह के अनुभव व परिश्रम के चलते कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की।

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