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“सर्वे भवंतु सुखिना” है भारत की संस्कृतिः- आचार्य देवव्रत

राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि”सर्वे भवंतु सुखिना”  भारत की संस्कृति रही है। सह-हृदय व्यक्ति दूसरों के कष्ट से दुःखी न होए ऐसा हो नहीं सकताए यह भारत की सोच रही है। यह चिंतन सबमें आना चाहिए और यही चिंतन आध्यात्म है।

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राज्यपाल गत सायं शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में प्रणव थियेटर, सोलन द्वारा भाषा, कला और संस्कृति विभाग के तत्वावधान में आयोजित और हेमंत अत्री द्वारा निदेशित नाट्क “गुड़ का हल्वा” के मंचन के पश्चात् लोगों को संबोधित कर रहे थे।
आचार्य देवव्रत ने कहा कि अभिव्यक्ति केवल मनोरंजन का ही साधन नहीं है बल्कि समाज की जटिल व्यवस्थाओं को व पीड़ितों की व्यथा को कला के माध्यम से हम तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी है।

उन्होंने कहा कि यह विडंबना है कि मजदूर भवन बनाता हैए लेकिन उसे झोंपड़ी तक नसीब नहीं होती और जो किसान अन्न पैदा करता है उसे भोजन नहीं मिलता। यह समाज की विकृति हैए जिसे कलाकारों ने नाट्क के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

उन्होंने कहा कि समाज में ऐसे कई सुधारक हुए, जिन्होंने साहूकारों के शोषण से किसानों को बचाने की जो मुहिम छेड़ीए उसी के परिणामस्वरूप आज समाज में परिवर्तन है।
उन्होंने कहा कि किसान व दलित को इस व्यवस्था से बाहर निकालने का जो संदेश नाट्क के माध्यम से दिया गया हैए वह प्रशंसनीय है। उन्होंने लोगों से समाज की उन्नति व विकास में सहयोग का आग्रह किया। उन्होंने लोगों से एकताए प्रेमए आनंद व भाईचारे का चिंतन समाज में प्रचारित करने का आह्वान किया ताकि एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सके।

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