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हिमाचल कांग्रेस में ‘राजा और रंक’ आमने-सामने, मुसीबत में शिंदे

शिमला

हिमाचल में विधानसभा चुनाव सिर पर आ चुके हैं, लेकिन कांग्रेस की आपसी खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही। हालत यहां तक पहुंच गए हैं कि पार्टी प्रभारी और सीनियर कांग्रेस लीडर सुशील कुमार शिंदे के सामने सरेआम मंच पर हिमाचल कांग्रेस के नेता एक-दूसरे पर आग उगल रहे हैं।

मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह व परिवहन मंत्री जीएस बाली के बीच राजनीतिक संबंधों में कड़वाहट तो घुली हुई थी लेकिन वो अब हद से आगे बढ़ रही है।

आलम ये है कि कांगड़ा जिला के नगरोटा बगवां में जीएस बाली ने सुशील कुमार शिंदे की मौजूदगी में ही बाली ने मंच से कह दिया कि राजा को रंक और रंक को राजा बनने में देर नहीं लगती। उनका साफ इशारा वीरभद्र सिंह की तरफ था।

दरअसल, चुनावी साल में कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई छिड़ी हुई है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पूरी कमान अपने हाथ में रखना चाहते हैं। वे टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार तक में अपना हाथ ऊपर रखना चाहते हैं।

हिमाचल में सियासी तौर पर कांगड़ा जिला सबसे अहम है। यहां सबसे अधिक 15 विधानसभा सीटें हैं।

कांगड़ा के मंत्री जीएस बाली की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। यही कारण है कि वीरभद्र सिंह जीएस बाली को किसी भी सूरत में आगे बढ़ते नहीं देखना चाहते। बाली के विधानसभा क्षेत्र नगरोटा बगवां में कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान सीएम वीरभद्र सिंह मौजूद नहीं थे।

लेकिन हिमाचल प्रभारी सुशील कुमार शिंदे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू उस आयोजन में मौजूद थे। शिंदे के सामने ही बाली ने परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री के खिलाफ पूरी भड़ास निकाली।

यही नहीं, सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने भी बाली को क्रांतिकारी सोच वाला नेता बता दिया। वहीं, ठीक उसी दिन कांगड़ा जिला में ही पुलिस विभाग के समारोह में मौजूद वीरभद्र सिंह ने बयान दे डाला कि इस दफा विधानसभा चुनाव में अधिकांश पुराने चेहरों को ही टिकट दिया जाएगा।

जाहिर है, वीरभद्र सिंह ये संकेत देना चाहते हैं कि चुनाव में उनकी ही अधिक चलेगी। इन परिस्थितियों में पार्टी प्रभारी सुशील कुमार शिंदे की कांग्रेस को एकजुट रखने की कोशिशों को धक्का लग रहा है।

कौल सिंह भी कह चुके हैं मन की बात

पिछले विधानसभा चुनाव में कौल सिंह प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। वीरभद्र सिंह ने हाईकमान पर दबाव बना कर खुद अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। उस दौरान कौल सिंह ने अपने मन की बात कही थी।

कौल सिंह ने कहा था कि वे भला मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकते? उनमें सीएम बनने की सारी काबिलियत हैं लेकिन कौल सिंह की ये हसरत मन में ही रह गई। वीरभद्र सिंह पिछले चुनाव में अकेले अपने दम पर पार्टी को सत्ता में ले आए। दिसंबर 2012 में वीरभद्र सिंह सीडी केस से बरी हुए और उन्होंने सीएम पद संभाल लिया।

 

चुनावी राजनीति के राजा के समक्ष बड़ी चुनौती
पचास साल के राजनीतिक जीवन में वीरभद्र सिंह के समक्ष इस दफा पहली बार बड़ी चुनौती है। वे आय से अधिक संपत्ति केस में ईडी व सीबीआई की जांच झेल रहे हैं।

इसके अलावा उनके सामने अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को स्थापित करने की जिम्मेदारी है। वीरभद्र सिंह अपने सीएम रहते विक्रमादित्य सिंह को विधायक बनते देखना चाहते हैं।

बता दें कि वीरभद्र सिंह शिमला ग्रामीण सीट को विक्रमादित्य सिंह के लिए छोड़ना चाहते हैं लेकिन कांग्रेस में उनकी राह आसान नहीं है। वीरभद्र सिंह चाहकर भी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू को कुर्सी से नहीं हटा पाए।

राज्य में विधानसभा चुनाव अक्टूबर महीने में हो सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस के पास गुटबाजी को थामने के लिए बहुत कम समय बचा है।

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