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राजा के दरबार से प्रजा गायब, क्या इस बार बुशहर रियासत में चलेगा वीरभद्र का जादू

रामपुर बुशहर

मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के गृह नगर रामपुर बुशहर में आज कांग्रेस के दो दिग्गजों ने नामांकन किया। दोनों प्रत्याशियों ने शक्ति प्रदर्शन भी किया।
एक ने कांग्रेस के टिकट पर तो दूसरे ने बगावत कर निर्दलीय तौर पर नामांकन किया।
कांग्रेस से बागी हुए सिंघी राम को अपने समर्थक रामपुर बुशहर पहुंचाना बेहद मुश्किल काम था क्योंकि एक तरफ कांग्रेसी नेताओं की किलेबंदी थी तो दूसरी ओर खुद मुख्यमंत्री वीरभद्र वहां पहुंचे थे।

बावजूद सिंघी राम के समर्थन में भारी संख्या में लोग खोपड़ी मंदिर पहुंचे और सिंघी राम के साथ कंधे से कंधा मिलाये खड़े रहे।
दूसरी तरफ कांग्रेस प्रत्याशी नंदलाल के साथ लोग तो पहुंचे लेकिन सभास्थल राजमहल से मुख्यमंत्री के सामने से चुपचाप एक एक कर चलते बने।
आलम यह था कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भाषण दे रहे थे और जनता जनार्दन कुर्सियां छोड़ जा रही थी।
एक समय ऐसा आया कि मुख्यमंत्री के समीप के ही चंद लोग उन्हें सुनने के लिए वहां मौजूद थे।
ऐसे में लगता है कि अब बुशहर रियासत की जनता का अपने राजा से मोहभंग हो गया है।
पूर्व में रामपुर बुशहर में मुख्य मंत्री का मतदाताओं में सिक्का चलता था।
वीरभद्र सिंह चुनाव प्रचार के लिए इलाके में जाते भी नहीं थे केवल अपना हस्ताक्षरित पर्चा अपील के रूप में बांटते थे और उनके प्रत्याशी की जीत पक्की हो जाती थी।
पहली बार रामपुर से कांग्रेस में बगावत हुई और अब आलम यह है कि लोग भी बगावत पर उतर आये हैं।
अब बदलती स्थिति में रामपुर बुशहर में कांग्रेस का कुनबा बच पाता है या नहीं, इस बाबत तो अभी कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस के लिए अब बुशहर क्षेत्र में रास्ता इतना आसान भी नहीं जितना पहले समझा जाता था।

क्योंकि रामपुर बुशहर कांग्रेस दो फाड् हो गई है। अगर बगावत न होती तो सारी प्रजा एक साथ होती। अब टुकड़ों में बंटती जा रही कांग्रेस के कुनबे को समेटना वीरभद्र के लिए एक बड़ी चुनोती है।

लेकिन वीरभद्र सिंह राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं जो कभी भी सत्ता को बदलने का मादा तख्ते हैं।

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