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हिमाचल के लिए ठीक नही ऐसा पोलिटिकल कल्चर

नगर निगम पर काबिज होने के लिए हिमाचल  भाजपा जिस तरह का हाई प्रोफाइल ड्रामा रच रही है वो हिमाचल की स्वस्थ राजनीति के लिए अच्छे संकेत नहीं है।

जोड़ तोड़ की राजनीति पहले भी हिमाचल में रही है लेकिन इस स्तर पर षड्यंत्र रचते कभी नही देखा गया था।

हां प्रदेश में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस ने रमेश धवाला प्रकरण को जरूर किया था लेकिन नगर निगम जैसे एक छोटे से सत्ता सुख के लिए भाजपा क्यो इतनी लालायित हो रही है ये किसी को समझ नहीं आ रहा है।

कांग्रेस यूँ भी हिमाचल में रिपीट करने की स्थिति में नही है और भाजपा मजबूत है। जब हालात भाजपा के पक्ष में हैं तो फिर ऐसा ड्रामा रचकर भाजपा आखिर क्या साबित करना चाहती है।

धन बल और बाहु बल के सहारे सत्ता हासिल तो की जा सकती है लेकिन ज्यादा समय तक इस पंर कब्जा रख पाना आसान नही होता।

इतिहास गवाह है हिटलर भी गया तो मुसोलिनी भी गया। कई तानाशाह आये लेकिन ज्यादा टिक नही पाए।

अब अगर निगम पर काबिज होने के लिए भाजपा ने अपनी सारी ताकत झोंक डाली है तो फिर विधानसभा चुनावों में क्या होगा।

इस लगता है अब एक नई रवायत हिमाचल में नजर आएगी। नई तरह की राजनीति होगी जहाँ चाणक्य के 5 मंत्र साम दाम दंड भेद और नीति सभी तरह के प्रपंच देखने को मिलेंगे।

यदि ऐसा हुआ तो फिर इस छोटे से पहाड़ी प्रदेश की स्वस्थ राजनीति को ग्रहण लग जायेगा और फिर क्या अंतर रह जायेगा हिमाचल और यूपी बिहार में।

ये सवाल प्रदेश को जनता और जननायक सोचें।

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