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हरित आवरण वृद्धि के लिये 15,000 हैक्टेयर में पौधरोपण का लक्ष्य

राज्य ने हासिल की वन विकास एवं पर्यावरण संरक्षण में ऐतिहासिक उपलब्धियां
शिमला
 वानिकी क्षेत्र प्रदेश सरकार की प्राथमिकताआें में से एक है। इस वर्ष प्रदेश के हरित आवरण को बढ़ाने व पर्यावरण संरक्षण के लिए 162.55 करोड़ रूपये व्यय कर 15,000 हैक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण का लक्ष्य रखा गया है जबकि गत् चार वर्षों में इस उद्देश्य के लिए 635.61 करोड़ रूपये व्यय कर 48,000 हैक्टेयर क्षेत्र को पौधरोपण के अधीन लाया गया।
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इस वर्ष 35 लाख औषधीय पौधे रोपने का लक्ष्य रखा गया है जबकि गत साढ़े चार वर्षों के दौरान विभिन्न योजनाओं के तहत 1.33 करोड़ औषधीय पौधे रोपे गए हैं। पौधरोपण कार्यक्रम में चौड़ी पत्ती, जंगली फलदार व औषधीय प्रजातियों पर बल दिया जा रहा है जिससे ग्रामीणों को पशुचारा, इंर्धन की लकड़ी के साथ-साथ जंगली फल व औषधी जैसी वन सम्पदा से स्वरोज़गार भी प्राप्त हो रहे हैं जिससे उनकी आर्थिकी में आशातीत सुधार हुआ है।
इसके अतिरिक्त, बाह्य सहायता प्राप्त 630.67 करोड़ की मध्य हिमालय जलागम विकास परियोजना, 227 करोड़ की स्वाँ नदी एकीकृत जलागम प्रबन्धन, 10 करोड़ की वन प्रबंधन एवं प्रशिक्षण क्षेत्र में क्षमता विकास, 310 करोड़ की हि.प्र. फौरेस्ट ईको-सिस्टम क्लाईमेट प्रूफिंग, 800 करोड़ की हि.प्र. वन ईको-सिस्टम प्रबन्धन एवं आजीविका तथा 665 करोड़ की हि.प्र.-समृद्धि हेतु वन परियोजनाएं सरकार द्वारा प्रदेशभर में योजनाबद्ध तरीके से कार्यान्वित की गईं तथा की जा रही हैं, जिससे वानिकी क्षेत्र को नई दिशा मिली है।
सरकार के इन्हीं प्रयासों के चलते भारतीय वन सर्वेक्षण संस्थान, देहरादून द्वारा जारी वर्ष 2015 की इंडिया स्टेट ऑफ फोरेस्ट रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में वनों के कुशल संरक्षण एवं प्रबन्धन के परिणाम-स्वरूप प्रदेश में 13 वर्ग कि.मी. वन क्षेत्र की वृद्धि हुई है जो एक सराहनीय प्रयास है। प्रदेश सरकार द्वारा समय-समय पर लिए गए नीतिगत निर्णयों से जहां वन कटान पर अंकुश लगा है वहीं प्रदेश में विकास की तीव्र गति के साथ-साथ हरित आवरण में पिछले दो दशकों में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
पौध-रोपण कार्यों के चलते हिमाचल की जनता को सीधे तौर पर लाभ मिलना आरम्भ हो गया है। हिमाचल प्रदेश कार्बन क्रेडिट प्राप्त करने वाला एशिया का पहला राज्य बन गया है। प्रदेश को कार्बन क्रेडिट के एवज में 1.93 करोड़ रुपये की प्रथम किश्त प्राप्त हुई है, जिसे इस कार्य से जुड़े उपभोक्ता समूहों व पंचायतों में वितरित किया गया है।
मुख्यमंत्री ने हाल ही में 68वें राज्य स्तरीय वन महोत्सव के अवसर पर जिला कुल्लू के पिरडी में स्वयं देवदार का पौधा रोपित कर प्रदेश में पौध-रोपण अभियान की शुरूआत की। इस अवसर पर पिरडी में विभिन्न प्रजातियों के पौधे रोपे गए। इसी प्रकार से राज्यपाल व लेडी गवर्नर ने भी मशोबरा स्थित भागी जुब्बड़ में स्कूली बच्चों के साथ पौधे रोप कर 68वें वन महोत्सव का शुभारम्भ किया। इस अवसर पर स्कूली बच्चों द्वारा विभिन्न प्रजातियों के सैंकड़ों पौधे रोपे गए। सरकार द्वारा प्रदेश के सभी सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं तथा आमजन को वर्षा ऋतु में ऐसे पौधरोपण अभियानों में बढ़-चढ़ कर भाग लेने की अपील की गई है, ताकि प्रदेश के हरित आवरण में वृद्धि की परिकल्पना को साकार किया जा सके।
पौधों की जीवित प्रतिशतता बढ़ाने के लिए पौधरोपण के रख-रखाव की अवधि तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष तथा कैटप्लान के तहत पांच वर्ष से सात वर्ष की गई है, साथ ही आर.सी.सी.फैंसिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि लगाये गये पौधे अधिक सुरक्षित हों और इस प्रयोजन हेतु वनों का कटान भी न हो। प्रदेश को लैंटाना जैसे खतरनाक खरपतवार से निजात दिलाने के लिए इस वर्ष 13.99 करोड़ रूपये खर्च कर 3689 हैक्टेयर वन भूमि को लैंटाना मुक्त तथा 3.97 करोड़ रुपये खर्च कर 743 हैक्टेयर वन भूमि को पुनःस्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है जबकि गत् साढ़े चार वर्षों में 58.29 करोड़ रुपये खर्च करके 29,981 हैक्टेयर वन भूमि को लैंटाना मुक्त कर ईंधन, चारा प्रजातियों तथा जल संरक्षण जैसे कार्य कर स्थानीय लोगों व घुमंतु चरवाहों को राहत पहुंचाई गई।
प्रदेश में सड़क निर्माण सहित अन्य विकासात्मक कार्य करने के लिए वन भूमि की अड़चन को दूर करने के लिए सरकार द्वारा गत् साढ़े चार वर्षों के दौरान वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत विभिन्न विकास योजनाओं की स्वीकृति प्रक्रिया सरल की गई है, जिसके अंतर्गत एक हैक्टेयर तक वन भूमि हस्तांतरण के मामले निपटाने के लिए राज्य सरकार को अधिकृत किया गया है। इसी के परिणामस्वरूप गत साढ़े चार वर्षों के दौरान विभिन्न विकासात्मक गतिविधियों हेतु 362 मामले वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत तथा 563 मामले वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत स्वीकृत किए गए, जिससे प्रदेश में विकासात्मक कार्यों को एक नई दिशा मिली है।
सरकार ने टी0डी0 नीति को स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं व अपेक्षाओं के अनुरूप संशोधित कर उसे अधिसूचित करना एक बड़ी उपलब्धि है। पुरानी टी0डी0 नीति के तहत लोगों को गृह निर्माण व मुरम्मत के लिए लकड़ी प्राप्त करने में बड़ी पेचीदगियों का सामना करना पड़ता था। नई नीति के तहत अब बर्तनदारां को नया घर बनाने के लिए 15 वर्षों में एक बार 7 घन मीटर तथा पुराने घर की मुरम्मत के लिए 5 वर्षों में एक बार 3 घन मीटर लकड़ी सरलता से उपलब्ध करवाई जा रही है।
वानिकी क्षेत्र से सम्बन्धित सरकार द्वारा महत्वपूर्ण कार्यों की श्रृंखला में सरकार के सतत् प्रयासों से वन्य प्राणी क्षेत्रों की सीमाओं के युक्तीकरण से आबादी वाले गाँवों को बाहर करना है। प्रदेश के 775 गाँवों के वन्य अभ्यारण परिधि में होने के कारण इन गाँवों में विकास को ग्रहण लगा हुआ था। सरकार के प्रयासों से 775 गाँवों को वन्य प्राणी क्षेत्रों की सीमाओं से छुटकारा सम्भव हुआ, जिससे जहां लगभग एक लाख से अधिक लोग लाभान्वित हुए हैं वहीं वन्य अभरण्य क्षेत्र भी लगभग 13 प्रतिशत से बढ़कर 15 प्रतिशत से अधिक हो गया है, जबकि राष्ट्रीय औसत 4 प्रतिशत है। इन क्षेत्रों में अब विकास के कार्य आरम्भ होने से विकासात्मक गतिविधियों को गति मिली है।
इसी अवधि के दौरान वर्ष 2014 में कुल्लू स्थित ग्रेट हिमालयन नैशनल पार्क, शमशी को युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा मिलना हम सबके लिए गर्व की बात है। इससे यह पार्क विश्व मानचित्र पर अंकित हुआ और प्रदेश में पर्यटन को नए आयाम मिले हैं। प्राकृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ईको-टूरिज्म पॉलिसी 2005 की समीक्षा कर नई प्रासंगिक नीति तैयार कर वर्ष 2016 में इसे अधिसूचित करना भी सरकार की उपलब्धियों में शूमार है। इससे स्थानीय लोगों को जहां आय के अतिरिक्त साधन उपलब्ध हुए हैं वहीं पर्यावरण संरक्षण में भी सहयोग मिला है।
वानिकी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रयास सरकार के मार्गदर्शन व जन-सहभागिता से ही सफल हो सकते हैं। बहुमूल्य वन सम्पदा को आने वाली पीढ़ियों के लिए संजोकर रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। इस प्रयास से हम जलवायु परिवर्तन से होने वाले दुष्परिणामों को कम करने में भी सहभागी बनेंगे।
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