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आधिनिकता की चकाचौंध में वजूद बरकरार रखे है “फ़ाग मेला”

एप्पल न्यूज़, रामपुर बुशहर

अब तो 6 दशक से अधिक हो गए, मुझे इस फाग मेला का आनंद लेते हुए।

बचपन में एक मास पहले से इस मेले का इंतज़ार बेसब्री से होने लगता । आजकल परीक्षा के दिन होते, अपने पास होने की फरयाद हर देवता के सामने रखते…… और देवता की कृपा मान, पास भी हो जाते ।

इस मेले में मां बाप से ज्यादा जेब खर्च नहीं मांगना पड़ता था , जो शायद अब तक कायम है। गर्म गर्म जलेबी, चटपटी चाट और गांव के दोस्तों से ‘मोड़ी’ की आस होती।

जवानी में मेला इस लिए अच्छा लगता क्योंकि इसमें युवतियों का आगमन अधिक होता। देवलुओं संग ढोल शहनाई पर नाटी डालना , संध्या में लोक नृत्य प्रतियोगिता का मंच संचालन करना, मन में अजब मस्ती प्रदान करता था।

वक्त के साथ शायद फाग अधिक नहीं बदला। बुजुर्ग जिन्होंने राजा पद्म सिंह के समय का फाग देखा है वह इस में अवश्य काफी बदलाव पाते हैं ।

इसकी एक ख़ासियत यह है कि इस मेले का आधिकारिक तौर पर मुख्य अतिथि द्वारा न तो कोई उद्घाटन होता है न समापन। मेले में कोई पुलिस कर्मी नजर नहीं आता। कभी कोई झगड़ा नहीं, धक्का मुक्का नहीं बस सुर, ताल व साज़ पर नाचते लोग……. कोई अमीर नहीं कोई गरीब नहीं….. कोई दुखी नहीं । सब मस्त….. सारा बुशहर मस्त !

इस मस्ती पर आशीर्वाद बना है, सदियों से आस्था के प्रतीक आस पास के देवी देवताओं का, जो आज भी काठी, मोहरे , लिबास व आभूषण से सुस्सजित हो अपने असंख्य श्रद्धालुओं के कंधे पर सवार होकर ढोल नगाढो़ सहित इस मेले में…. इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपना अस्तित्व आज भी शान से बरकरार रखे हैं ।

आज जब इन देवताओं के आगे खड़े होकर सोच रहा हूँ….. यदि ये न होते तो हमारे न्यायालयों में व चिकित्सालयों न जाने कितने और cases बढ़ जाते , समाज में जुर्म बढ़ जाता… क्योंकि अब भी हमारी आस्था इन देवताओं पर अगाध है ।और इनका फैसला किसी अपील को नहीं मानता।

हां, मोड़ी डाठु , व दुप्पटा का लुप्त हो जाना खटक रहा था । हर हाथ में मोबाइल व सैलफी की युवाओं में होड़ , मेले की मस्ती में खलल डाल रही थी । दरबार मैदान में घटिया खाद्य पदार्थ के छोटे स्टालों का बढ़ना व उनके द्वारा मैदान में गंदगी का फैलना, अच्छा नहीं लगा।

स्थानीय फाग कमेटी व विशेषकर ‘ बुशहर संस्कृति बचाओ संस्था ‘ को आगे आकर इस गौरवशाली ऐतिहासिक पर्व को और अधिक आकर्षित बनाना चाहिए । लोक नृत्य प्रतियोगिता व महिला सशक्तिकरण हेतू एक महिलाओं द्वारा सामूहिक बुशहर परिवेश में नाटी का आयोजन संभव है , जो इसे एक अलग पहचान देगा ।

स्व कंवर राजपाल के बिना मेले में एक vacuum सा बन गया है….. जो एक कसक उनको दे गया है, जिन्होंने ने उस शख्सियत को सुर, ताल व साज़ पर नाटी लगाते देखा है ! उन्हें नमन!

यह मेला परंपरांओ, रस्मों व पारस्परिक प्यार व श्रद्धा का संगम है , जो भविष्य को हमारे सुनहरे इतिहास को जोड़ता है। हमें इस पर गर्व है !

आप सभी को फाग मेला की हार्दिक शुभकामनाएँ !

लेखक

खुशहाल ठाकुर

शिक्षाविद एवं समाजसेवी

रामपुर बुशहर

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