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शिमला चैप्टर ने मनाया PRSI Day, “एक राष्ट्र- एक संकल्प- एक स्वर” विषय पर किया सेमिनार

एप्पल न्यूज़, शिमला

पब्लिक रिलेशन सोसायटी ऑफ इंडिया शिमला चैप्टर द्वारा ‘पीआरएसआई दिवस’ के मौके पर रविवार को शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में एक सेमिनार का आयोजन किया गया। “एक राष्ट्र- एक संकल्प- एक स्वर” विषय पर आयोजित इस सेमिनार की अध्यक्षता चैप्टर के संस्थापक व संरक्षक बीडी शर्मा ने की। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला के रिसर्च स्कॉलर डॉ आशुतोष भारद्वाज मौजूद रहे। शिमला चैप्टर के अध्यक्ष अशोक शर्मा ने मुख्य वक्ता का स्वागत किया।

इस सेमिनार के इस वर्ष के थीम “एक राष्ट्र- एक संकल्प- एक स्वर” विषय पर अपने वक्तव्य में डॉ आशुतोष भारद्वाज ने कहा कि भारत का स्वर और भारतीयता के स्वरुप का सवाल इस भूखंड के निवासियों की राजनैतिक चेतना में पहली बार उन्नीसवीं सदी के दौरान आया। अभी भी अनेक निवासी इस सवाल को सुन कर चौंक जायेंगे क्योंकि हिमाचल के किसी पहाड़ी गाँव में लकड़ी काटती किसी महिला या खेत में जुटे किसी आदमी से अगर पूछा जाए कि भारत का स्वर क्या है? शायद वह आपको चौंक कर देखेंगे मानो आपने क्या पूछ डाला।

डॉ आशुतोष भारद्वाज ने कहा कि भारतीय परम्परा मोक्ष का महत्व बताती है, लेकिन कर्ज लेकर घी पीने वाले चार्वाक को अपने षड्-दर्शन में स्थान देती है। यहाँ राम की भी पूजा होती है, रावण की भी। दुर्गा की और महिषासुर की भी। क्योंकि भारतीयता राजनीति में नहीं, संस्कृति में निवास करती है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद हमने अपने लिए एक राष्ट्रीय पशु, एक राष्ट्रीय पक्षी, एक झंडा इत्यादि चुना है और उसकी राजनैतिक ज़रूरत भी है। हमारा राष्ट्रीय पशु शेर है, लेकिन कितने लोगों ने उसे किसी चिड़ियाघर के अलावा कहीं और देखा है…? जिस प्राणी से हमारा स्नेह, हमारा रिश्ता सबसे अधिक है, तो शायद वह गाय और भैंस है। मेरे घर में रोज़ सुबह पहली रोटी गाय के लिए अलग से निकाली जाती है। मेरी माँ के लिए शायद गाय ही राष्ट्रीय पशु है। भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद, फूल कमल है लेकिन हिमाचल का फूल बुरांश है, और वृक्ष देवदार। हिमाचल के लोग देवदार से कहीं अधिक प्रेम करते हैं।
डॉ आशुतोष भारद्वाज ने कहा कि आज राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को भटकाया जा रहा है। राष्ट्र और देश के नाम पर लोग भृमित हैं। जबकि स्पष्ट है कि देश किसी सिमा में बंध होता है जबकि राष्ट्र की कोई सीमा नहीं होती। जब मनुष्य ‘तुम में भी मैं’ की नीति पर कार्य करेगा तो ये लड़ाई झगड़े और दंगे स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे।
राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोकर रखना है तो हमें अपनी संस्कृति को बचाना होगा। अपने काव्य और विश्व भर के लिखित ग्रंथो का पठन पाठन करना होगा। जब अपनी संस्कृति, सभ्यता और पूर्वजों के आदर्शों पर चलेंगे तभी सही मायने में राष्ट्र आगे बढ़ेगा। राष्ट्र को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। भारत 1947 मे नहीं बना बल्कि कई शताब्दियों पहले से विद्यमान है। कई भाषा, बोलियों, रस्म, रिवाजों, धर्म, जाति और सम्प्रदाय की संस्कृति और सभ्यताओं को अपने मे समेटे कई विचारधाराओं को एक साथ लेकर आगे बढ़ रहा है। इसलिए भारत का स्वर शायद यही है कि इसका कोई एक स्वर नहीं है।
इस मौके पर अपने अध्यक्षीय भाषण में बीडी शर्मा ने कहा कि डॉ आशुतोष ने कम उम्र में ही दर्शन और शास्त्रों के अध्ययन से अपनी संस्कृति और सभ्यता को गहराई से समझा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के सेमिनार समाज के उत्थान के लिए बेहद जरूरी हैं।
वहीं पीआरएसआई के अध्यक्ष अशोक शर्मा ने सभी का आभार जताते हुए कहा कि शिमला चैप्टर समय समय पर इस तरह के सेमिनार करवाता रहता है। हर वर्ष 21 अप्रैल को पीआरएसआई डे मनाया जाता है और देश के सभी 30 चैप्टर आज ऐसे आयोजन कर रहा है। इस वर्ष का थीम “एक राष्ट्र- एक संकल्प- एक स्वर” विषय पर था। सेमिनार में पीआरएसआई शिमला चैप्टर के पदाधिकारी, सदस्यगण और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थी मौजूद रहे।

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