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डा यशवंत सिंह परमार की 113वीं जयन्ती के अवसर पर कांग्रेस कार्यालय और उनके गांव में श्रद्धांजलि समारोह

एप्पल न्यूज़, शिमला

हिमाचल प्रदेश के निर्माता एवं प्रथम मुख्यमंत्री डा0 यशवंत सिंह परमार की 113वीं जयन्ती के अवसर पर पार्टी कार्यालय राजीव भवन शिमला में कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें कांग्रेस जनों ने स्व0 यशवंत सिंह परमार को श्रद्वांजि दी और हिमाचल प्रदेश के गठन के लिए उनके योगदान को याद किया।

सिरमौर जिला के चनालग गांव में 4 अगस्त 1906 को जन्में डॉ॰ यशवंत सिंह परमार भारत के राजनेता एवं स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी थे। वह हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे। उनका हिमाचल प्रदेश को अस्तित्व में लाने और विकास की आधारशिला रखने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लगभग 3 दशकों तक कुशल प्रशासक के रूप में जन-जन की भावनाओं संवेदनाओं को समझते हुए उन्होने प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए हिमाचल प्रदेश के विकास के लिए नई दिशाएं प्रस्तुत की। उनका सारा जीवन प्रदेश की जनता के लिए समर्पित रहा वे उम्र भर गरीबों और जरुरतमंदों की सहायता करते रहे।

डॉ॰ परमार का जीवन संघर्षशील व्यक्ति का जीवन रहा। उन्होने सिरमौर रियासत में 11 वर्षों तक सब जज और मैजिसट्रेट के बाद जिला और सत्र न्यायधीश के रूप में अपनी सेवाए दी। वे नौकरी की परवाह ना करते हुए सुकेत सत्याग्रह प्रजामण्डल से जुड़े! उनके ही प्रयासों से यह सत्याग्रह सफल हुआ। डॉ॰ परमार के प्रयासों से ही 15 अप्रैल 1948 को 30 सियासतों के विलय के बाद हिमाचल प्रदेश बन पाया और 25 जनवरी 1971 को इस प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।

डॉ. यशवंत सिंह परमार मिाचल प्रदेश के पहले मुख्यवमंत्री थे। हिमाचल प्रदेश के गठन में उनका अहम योगदान रहा है। ऐसे में उन्हेंह हिमाचल निर्माता भी कहा जाता है। पहाड़ो की भोली-भाली, कम साक्षर व भौगोलिक परिस्थितियो से जूझ रही जनता को विकास के सपने दिखाए नही, बल्कि उनका पूरा ताना-बाना बुन कर भविष्य की राह पर अग्रसर भी किया। वह हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार ही थे, जिन्होने एलएलबी व पीएचडी होने के बावजूद धन-दौलत या उच्च पदो का लोभ नही किया, बल्कि सर्वस्व प्रदेशवासियो को पहाड़ी होने का गौरव दिलाने मे न्यौछावर कर दिया। परमार हिमाचल की राजनीति के पुरोधा व प्रथम मुख्यमंत्री ही नही थे, वह एक राजनेता से कही बढ़कर जननायक व दार्शनिक भी थे, जिनकी तब की सोच पर आज प्रदेश चल रहा है। कृषि-बागवानी से लेकर वानिकी के विस्तार सहित जिन प्राकृतिक संसाधनो पर आज प्रदेश इतरा रहा है, भविष्य का यह दर्शन उन्ही का था। वह कहा करते थे कि सड़के पहाड़ो की भाग्य रेखाएं है.. और आज यही प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ है।

पर्यावरण की जिस चिंता मे आज देश-प्रदेश ही नही पूरा विश्व डूबा है, उस कर्मयोद्धा ने इसकी आहट को दशकों पहले ही सुन लिया था। उन्होने कहा था कि वन हमारी बहुत बड़ी संपदा है, सरमाया है। इनकी हिफाजत हर हिमाचली को हर हाल मे करनी है, नंगे पहाड़ो को हमे हरियाली की चादर ओढ़ाने का संकल्प लेना होगा। प्रत्येक व्यक्ति को एक पौधा लगाना होगा और पौधे ऐसे हो जो पशुओ को चारा दे, उनसे बालन मिले और बड़े होकर इमारती लकड़ी के साथ आमदनी भी दे। वनो के त्रिस्तरीय उपयोग को लेकर परमार का कहना था कि कतारो मे लगाए इमारती लकड़ी के जंगल प्रदेश के फिक्स डिपोजिट होगे। बाग-बगीचे लगाकर हम तो संपन्न हो सकते है] लेकिन वानिकी से पूरे प्रदेश मे संपन्नता आएगी। वह राजनीति मे पारदर्शिता के उदाहरण व प्रदेश मे कृषि-बागवानी के प्रबल समर्थक थे।

इस अवसर पर विधायकगण] पूर्व विधायकगण] प्रदेश कांग्रेस कमेटी तथा जिला शिमला शहरी कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारीगण एवं पूर्व पदाधिकायिों तथा अग्रणी संगठनों के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में कांग्रेसजन उपस्थित थे।

                                                               

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