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तब पटाखों का नियोजित परिवार था और वास्तव में मकान ‘घर’ थे…!

एप्पल न्यूज़, रामपुर बुशहर

” हमारे बचपन की दिवाली व आज की दिवाली के प्रकाश में बहुत विषमता प्रतीत होती है। वह प्रकाश आंखों को सकून देता था, उस में एक दूसरे के चेहरे आसानी से आत्मीयता बिखेरते दिखाई देते थे। उस प्रकाश की वोल्टेज सभी जगह चाहे वह कोठी हो या कुटिया एक समान प्रकाश बिखेरती थी।

मिठाई में बताशे व खील्ले की प्लेट का आदान प्रदान केवल पड़ोस तक सीमित था और इन का टोकरी में भंडार हमारे लिए काफी दिनों तक एक टोनिक की तरह उर्जा प्रदान करता था।

पटाखों का नियोजित परिवार था जिसमें फुलझड़ी ,जलेबी व छोटे पटाखों की लड़ियां होती थीं जो अमीर व गरीब के आंगन में जब मनमोहक तांडव मचाते थे तो कानों में अजीब सी गुदगुदी व आंखों व मन को गज़ब का स्पंदित कर देते थे।

छोटे छोटे घरों को हम सभी स्वयं रंगते थे क्योंकि तब चूने के लेप से जो चमक आती थी वह शायद आज के अपैक्स को मात दे दे। तब वास्तव में मकान ‘घर’ थे जो अब घर न रह कर मकान बन गए हैं। छोटे से घर में सारा परिवार ऐडजस्ट हो जाता था, अब बड़े मकानों के बड़े बड़े कमरों में सब कुछ है पर आदमी नहीं मिलता।

आज की दिवाली को आप स्वंय उस दिवाली से अलग कर सकते हैं। ऐसा करते समय केवल अपने कान, आंख व मुँह बंद रखें क्योंकि ऐसा न करोगे तो प्रदूषण नाम के राक्षस के ग्रास बन जाओगे। मन को योगी की तरह संयम में न करोगे तो इसके बनावटी छल के शिकार होकर व्यर्थ में मन व्यथित कर लोगे… क्योंकि आज की दिवाली के कीमती मिष्टान में सौहार्दता, स्वाभाविकता व आत्मीयता लुप्त हो गई है।

खैर माना कि समय गतिशील व परिवर्तनशील है….. पर ‘अपनापन’ इस गति व परिवर्तन में कहां, क्यों व कैसे खो गया ? इस दिवाली के शोर शराबे में उत्तर मिल तो रहा है …….पर शायद सुनाई नहीं दे रहा।

साभार-खुशहाल ठाकुर, शिक्षाविद रामपुर बुशहर

दिवाली की शुभकामनाएं !

एप्पल न्यूज़ की ओर से भी सभी पाठकों को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं

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