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तत्तापानी- अगली पीढ़ी पूछेगी कि कहाँ होता था नाहौन ..?

एप्पल न्यूज़

सुन्नी , मेरे गाँव के समीप तत्ता पानी । यह दो तस्वीरें है एक ही जगह की । यह तस्वीर है इतिहास और वर्तमान की । टेंट लगा कर पहली तस्वीर में मेला लगा है मक्कर संक्रांत का । मुझे याद है बचपन से लेकर दादी और ममी डैडी के साथ यहाँ 14 जनवरी को आना होता था । यहाँ के खारे उबलते सल्फ़र वॉटर में लोग नहाते थे । कहते थे इसे – गर्म पानी का चोबा । एक चोबे में कई लोग ।पहले तो क्रेज़ था यहाँ लगने वाले मेले का जहां कई रंगों की मिठाई देख देख के अच्छा लगता था ।


बड़ा नाहौन में जाना पवित्र माना जाता । संक्रांत की अपनी महता है तो तत्ता पानी की भी । गर्म गर्म पानी के चश्मे और साथ में गहरी सतलुज का ठंडा पानी । सल्फ़र की महक भी सतलुज के पथरों से धधकती निकलती । यह तस्वीर हाल के सालों की अंतिम थी जब यहाँ आख़िरी सक्रांत का नाहौन हुआ था । इसके बाद यह पूरी जगह जहां गर्म पानी था ,वो सतलुज में बने डैम में मर्ज़ हो गया । मैं बार बार वहाँ जाती तो एक आम का पेड़ देखती और एक बरगद का । कभी सर उठाए दोनो पेड़ ऐसे खड़े थे कि मजाल है की टहनी भी हिल जाए । मानो कुदरत की मेहर पर इतरा रहे हों ।

करसोग जाते हुए मेरा ध्यान इन दो पेड़ों पर रहा की डैम के पानी में कब तक तने रहेंगे अब ? कुछ महीने बीते , पेड़ों की टहनियाँ दिखी और बाद में कुछ पत्तियाँ रह गई। अब ना वो पेड़ रहे ना सल्फ़र की गंध । दिखा तो पानी का ठहरा सैलाब । वो दादी और डैडी के हाथों की उँगलिया भी सरक गई और संक्रांत के नाहौन की हक़ीक़त भी । तत्ता पानी कहाँ गया यह सवाल अगली पीढ़ी पूछेगी कि कहाँ होता था नाहौन ?

डॉ रचना गुप्ता की कलम से

(लेखिका पूर्व सम्पादक और वर्तमान में राज्य लोक सेवा आयोग सदस्य हैं)

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