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चायल वन्यजीव अभयारण्य में पहली बार दर्ज हुआ नीलकंठ, ऊंचाई पर मौजूदगी ने खींचा विशेषज्ञों का ध्यान

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एप्पल न्यूज़, चायल /शिमला
चायल वन्यजीव अभयारण्य में पक्षी विविधता को लेकर एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सामने आया है। अभयारण्य क्षेत्र में पहली बार नीलकंठ (Coracias benghalensis) की मौजूदगी दर्ज की गई है। वन्यजीव निगरानी के दौरान यह महत्वपूर्ण अवलोकन वन खंड अधिकारी नीलम ठाकुर, एफजीडी शालिंदर, एफजीडी अनूप, एफजीडी सुमित्रा, वन मित्र रूपल और मेहर की टीम ने किया।
नीलकंठ अपने चमकीले नीले और फिरोजी रंग के कारण आसानी से पहचाना जाने वाला पक्षी है। उड़ान के दौरान इसके पंखों का आकर्षक नीला रंग विशेष रूप से दिखाई देता है। यह पक्षी सामान्यतः मैदानी इलाकों, खुले क्षेत्रों, कृषि भूमि, घास के मैदानों और अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। इसे अक्सर पेड़ों, बिजली के तारों अथवा अन्य ऊंचे स्थानों पर बैठकर कीड़े और छोटे जीवों का शिकार करते देखा जाता है।
ऐसे में करीब 2,100 से 2,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चायल वन्यजीव अभयारण्य में नीलकंठ का दर्ज होना विशेष महत्व रखता है। हिमांशु चौधरी के अनुसार नीलकंठ आमतौर पर मैदानी और कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों से जुड़ा पक्षी माना जाता है, इसलिए चायल में इसकी मौजूदगी विशेषज्ञों और पक्षी प्रेमियों के लिए खासा रोचक अवलोकन है।


हिमाचल प्रदेश के अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी नीलकंठ के असामान्य रिकॉर्ड सामने आ चुके हैं। इनमें वर्ष 2014 में सांगला और वर्ष 2023 में काजा में दर्ज रिकॉर्ड शामिल हैं। हालांकि चायल वन्यजीव अभयारण्य से नीलकंठ का इससे पहले कोई ज्ञात रिकॉर्ड सामने नहीं आया था। इस लिहाज से यह अवलोकन अभयारण्य की दर्ज पक्षी विविधता में एक महत्वपूर्ण नया जुड़ाव माना जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश की eBird समन्वयक डॉ. मल्यश्री भट्टाचार्य ने भी पुष्टि की है कि चायल वन्यजीव अभयारण्य से नीलकंठ का यह पहला ज्ञात रिकॉर्ड है। उन्होंने इसे महत्वपूर्ण अवलोकन बताते हुए कहा कि अलग-अलग ऊंचाई और आवास वाले क्षेत्रों में पक्षियों की नियमित निगरानी और दस्तावेजीकरण बेहद जरूरी है। ऐसे रिकॉर्ड पक्षियों के वितरण, उनके आवागमन, आवास में होने वाले बदलाव तथा विभिन्न मौसमों में उनकी मौजूदगी को समझने में मदद करते हैं।
पक्षी विशेषज्ञ अंकुश ठाकुर ने बताया कि प्रवास के दौरान पक्षियों की आवाजाही पर नजर रखना पक्षी प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। इस दौरान कई बार ऐसे क्षेत्रों में भी पक्षियों की मौजूदगी सामने आती है, जहां पहले उनका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं रहा है। लगातार फील्ड ऑब्जर्वेशन से हिमालयी क्षेत्र में पक्षियों के प्रवास मार्ग और उनकी आवाजाही से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जा सकती है।


स्टेट बर्ड काउंट समन्वयक संतोष ठाकुर ने कहा कि वन्यजीवों की नियमित और व्यवस्थित निगरानी हिमाचल प्रदेश में पक्षियों से जुड़ा मजबूत डेटाबेस तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार इस तरह का सर्वेक्षण किया जाए तो समय के साथ महत्वपूर्ण रिकॉर्ड तैयार होंगे, जिससे प्रदेश की पक्षी विविधता को बेहतर ढंग से समझने और संरक्षण की योजनाओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
इस महत्वपूर्ण अवलोकन पर पूरी टीम को बधाई देते हुए डॉ. शहनवाज, आईएफएस, डीसीएफ वन्यजीव शिमला ने कहा कि इस तरह के वन्यजीव निगरानी प्रयास बेहद उत्साहजनक और महत्वपूर्ण हैं। नियमित निगरानी से अभयारण्य में मौजूद प्रजातियों का दस्तावेजीकरण करने के साथ-साथ प्रवासी पक्षियों की आवाजाही और उनके पैटर्न को समझने में भी मदद मिलती है।
चायल में नीलकंठ का यह पहला दस्तावेजीकृत रिकॉर्ड इस बात का उदाहरण है कि लगातार फील्ड निगरानी, नागरिक विज्ञान और व्यवस्थित वन्यजीव अध्ययन से हिमाचल प्रदेश की जैव विविधता के संबंध में नई और महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती हैं। हिमाचल में मैदानी जंगलों से लेकर ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों तक विभिन्न प्रकार के आवास मौजूद हैं। ऐसे में नियमित सर्वेक्षण के दौरान कई बार ऐसी प्रजातियां भी सामने आती हैं, जो सामान्यतः उस क्षेत्र में अपेक्षित नहीं होतीं या जिनका वहां पहले कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता।
चायल वन्यजीव अभयारण्य में नीलकंठ का यह रिकॉर्ड महज पक्षियों की सूची में एक नई प्रजाति जुड़ने तक सीमित नहीं है। यह लगातार प्रकृति अवलोकन, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और नागरिक विज्ञान के महत्व को भी रेखांकित करता है। ऐसे रिकॉर्ड भविष्य में हिमाचल प्रदेश की समृद्ध पक्षी विविधता, उनके वितरण और संरक्षण संबंधी अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण आधार साबित हो सकते हैं।

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