घोटाला- ठियोग में 1.13 करोड़ के पेयजल घोटाले में जलशक्ति विभाग के 10 अधिकारी सस्पेंड, 5 JE, 3 SDO, 2 Exen पर गिरी ग़ाज

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एप्पल न्यूज, शिमला

हिमाचल प्रदेश सरकार ने ठियोग में पेयजल आपूर्ति से संबंधित घोटाले में बड़ी कार्रवाई करते हुए 10 अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है और पानी की आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है।

यह कार्रवाई जल शक्ति विभाग के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी डॉ. ओंकार चंद शर्मा द्वारा सुप्रिंटेंडिंग इंजीनियर (SE) की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर की गई। इसके साथ ही, मामले की विस्तृत जांच के लिए विजिलेंस के ADGP को एक पत्र लिखा गया है।

सस्पेंड किए गए अधिकारियों में मत्याना डिवीजन के एक्सईएन अशोक कुमार भोपाल, कसुम्प्टी डिवीजन के एक्सईएन बसंत सिंह, मत्याना SDO परनीत ठाकुर, कोटी SDO राकेश कुमार, कोटगढ़ में तैनात SDO विवेक शर्मा, ठियोग के JE मस्त राम बराक्टा, लाफूघाटी के JE सुरेश कुमार, मत्याना के JE नीम चंद, रिटायर्ड JE सुदर्शन और धरेच फागू के JE सुनील कुमार शामिल हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने ठियोग में पेयजल आपूर्ति के नाम पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया।

मामला तब उजागर हुआ जब पूर्व माकपा विधायक राकेश सिंघा ने यह आरोप लगाया कि ठियोग में पानी की आपूर्ति के लिए झूठे आंकड़े पेश किए गए।

उन्होंने कहा कि पानी को टैंकरों के बजाय मोटरसाइकिल, ऑल्टो कार, के-10 और अन्य छोटे वाहनों में ढोने का दावा किया गया।

सिंघा ने बताया कि एक मोटरसाइकिल पर 11 चक्कर लगाकर 22,000 लीटर पानी सप्लाई दिखाया गया और इसके लिए 23,000 रुपये का भुगतान किया गया।

इसी तरह, ऑल्टो कार में 15 चक्कर लगाकर 30,000 लीटर पानी ढोया गया और इसके बदले 33,000 रुपये दिए गए। इन फर्जी बिलिंग और अनियमितताओं के चलते 1.13 करोड़ रुपये की हेराफेरी का आरोप सामने आया।

सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए घोटाले में शामिल सभी अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है।

ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करना यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि भविष्य में ऐसे लोग सरकारी परियोजनाओं में शामिल न हो सकें।

वहीं, विस्तृत जांच के आदेश देकर सरकार ने इस बात पर जोर दिया है कि दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

ठियोग क्षेत्र में पानी की समस्या पहले से ही गंभीर है। ऐसे में इस तरह के घोटाले ने स्थानीय निवासियों की परेशानियों को और बढ़ा दिया है।

यह मामला न केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करता है, बल्कि सरकारी अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच मिलीभगत की गंभीरता को भी दर्शाता है।

हिमाचल प्रदेश सरकार ने इस घटना के माध्यम से भ्रष्टाचार के प्रति अपनी जीरो टॉलरेंस नीति को स्पष्ट किया है।

सरकार की इस कार्रवाई को आम जनता और राजनीतिक वर्ग में सराहना मिल रही है। यह कदम भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा संदेश देने के साथ-साथ सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास है।

अब सभी की नजरें विजिलेंस जांच की रिपोर्ट पर हैं, जो यह तय करेगी कि इस मामले में और कितने लोग शामिल हैं और दोषियों को किस हद तक सजा दी जाएगी।

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