एक सप्ताह से जारी है पशुओं की मौत का सिलसिला, विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम न पहुंचने से बढ़ी नाराजगी; बाजार से खरीदी दवाएं भी बेअसर
एप्पल न्यूज़, चौरा किन्नौर
किन्नौर जिले के चौरा के जंगलों में इन दिनों भेड़-बकरियों पर बीमारी का कहर टूट रहा है। पिछले एक सप्ताह से जारी पशुओं की मौत के सिलसिले ने भेड़ पालकों की चिंता बढ़ा दी है। पशुपालकों का आरोप है कि अब तक बीमारी की सही पहचान नहीं हो पाई है और न ही प्रभावी उपचार की व्यवस्था की गई है। हालात यह हैं कि बीमार पशुओं को बचाने के लिए पशुपालक बाजार से दवाएं खरीदने को मजबूर हैं, लेकिन उनका भी अपेक्षित असर नहीं दिख रहा है।
भेड़ पालकों का कहना है कि पशुपालन विभाग के पास आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में उन्हें दवाओं की सूची थमाकर बाजार से खरीदारी करने के लिए कहा जा रहा है। पशुपालकों का सवाल है कि जब बीमारी की पहचान ही नहीं हुई है और दवाओं से भी राहत नहीं मिल रही, तो उनके पशुओं को बचाने के लिए प्रभावी कदम कब उठाए जाएंगे।
फार्मासिस्ट के सहारे चलता रहा उपचार, चिकित्सक पहुंचे तो दवाओं का अभाव
भेड़ पालकों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह से बीमार पशुओं के उपचार की कोशिश एक फार्मासिस्ट के सहारे की जा रही थी। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम मौके पर भेजने की मांग की थी, ताकि बीमारी की पहचान कर समय रहते उचित उपचार शुरू किया जा सके। हालांकि, पशुपालकों का आरोप है कि उनकी मांग पर समय रहते विशेषज्ञों की टीम नहीं पहुंची।
बुधवार को एक पशु चिकित्सक के मौके पर पहुंचने के बाद भी पशुपालकों की परेशानी कम नहीं हुई। उनका कहना है कि आवश्यक दवाएं उपलब्ध न होने के कारण उपचार की प्रभावी व्यवस्था नहीं बन पाई। चिकित्सक की ओर से दवाओं की सूची दिए जाने के बाद पशुपालकों को खुद बाजार से दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
एक ओर जंगल में बीमार पशुओं की देखभाल करना उनकी मजबूरी है, तो दूसरी ओर दवाओं के इंतजाम के लिए बाजार के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। इस बीच पशुओं की लगातार बिगड़ती हालत और मौतों से भेड़ पालकों में भय का माहौल है।
जानी क्षेत्र में भी सामने आए थे ऐसे मामले, फिर भी नहीं चेता विभाग
भेड़ पालकों का कहना है कि चौरा में पशुओं के बीमार पड़ने का यह पहला मामला नहीं है। कुछ दिन पहले निचार उपमंडल के जानी क्षेत्र में भी इसी तरह की बीमारी से भेड़-बकरियों की मौत होने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद चौरा में बीमारी फैलने के बाद समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
पशुपालकों ने सवाल उठाया है कि जब पहले भी इस तरह के मामले सामने आ चुके थे, तो पशुपालन विभाग ने बीमारी की संभावित पहचान, जरूरी दवाओं की उपलब्धता और आपातकालीन पशु चिकित्सा सेवाओं को लेकर क्या तैयारियां की थीं? उनका कहना है कि यदि समय रहते विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम भेजकर जांच शुरू की जाती, तो पशुओं को बचाने के लिए प्रभावी उपचार जल्द शुरू हो सकता था।
पशु ही आजीविका का सहारा, मौतों से परिवारों पर संकट
पहाड़ी क्षेत्रों में भेड़ पालन अनेक परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन है। ऐसे में भेड़-बकरियों की लगातार मौतें पशुपालकों के लिए केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और परिवार के भविष्य पर संकट के समान हैं।
भेड़ पालक मेहर चंद, मोहन सिंह, अशोक कुमार और फकीर चंद सहित अन्य लोगों ने सरकार और पशुपालन विभाग से तत्काल विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम चौरा भेजने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले बीमारी की सही पहचान की जाए और उसके अनुरूप उपचार तथा आवश्यक दवाओं की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
पशुपालकों का कहना है कि केवल दवाओं की सूची थमाकर उन्हें बाजार भेजने से समस्या का समाधान नहीं होगा। विभाग को मौके पर रहकर बीमार पशुओं के उपचार और उनकी स्थिति में सुधार की निगरानी करनी चाहिए।
जवाबदेही तय करने और तत्काल कार्रवाई की मांग
चौरा के जंगलों में भेड़-बकरियों की लगातार हो रही मौतों ने पशु चिकित्सा व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पशुपालकों की मांग है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए बीमारी की वैज्ञानिक जांच करवाई जाए, विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम तैनात की जाए और आवश्यक दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
इसके साथ ही जानी क्षेत्र में पहले सामने आए मामलों के बाद विभाग की ओर से उठाए गए कदमों की भी समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि चौरा में बीमारी फैलने के बाद समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हो पाई।
भेड़ पालकों ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप कर बीमार पशुओं को बचाने के लिए प्रभावी उपचार व्यवस्था शुरू करने की मांग की है। उनके लिए यह केवल पशुओं की बीमारी का मामला नहीं, बल्कि उनकी रोजी-रोटी और वर्षों की मेहनत को बचाने की लड़ाई है। अब पशुपालकों को आश्वासनों के बजाय मौके पर ठोस कार्रवाई का इंतजार है।



