“मैं खाकी हूं -घर पर नहीं रह सकती”

कोरोना की जंग में कर्मवीर महिला पुलिस भी पीछे नहीं

एप्पल न्यूज़

जो सुन्दर मृदुभाषी व कोमल हाथ लिये हुए एक बच्चे का झूला झुला सकती है वही हाथ एक चंडी का हाथ बनकर, आतताईयों, दुराचारियों व दरिंदों के लिए खड़ग, कृपांण व बुलेट का काम भी कर सकता है।

जी हाँ, पुरूष प्रधान समाज में यहां भारत में लगभग 48 प्रतिशत महिलाओं का लिंग अनुपात है। जहाँ लगभग 50 प्रतिशत से अधिक मुक़द्दमे महिलाओं से ही संबधित होते हैं वहां केवल कुल पुलिस का आठ प्रतिशत भाग ही महिला पुलिस का है। इसी तरह भारत की अखिल भारतीय पुलिस सेवा में कुल अधिकारियों का छह प्रतिशत भाग ही महिला पुलिस अधिकारियों के रूप में तैनात है। समाज की सभी रूढिवादी व परम्परागत बेड़ियों को तोड़ती हुई महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपना शौर्यपूर्ण स्थान अर्जित किया है। आज चाहे थल, वायु, जल सेना, अंतरिक्ष में हो चाहे कोई अन्य चुनौतियों भरा क्षेत्र ही क्यों न हो इन्होंने हर जगह अपने जज़्बे, जुनून, उत्साह, शौर्य व बलिष्ठता का परिचय दिया है।


आरम्भ में इस पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं की पुलिस में भागीदारी नाम मात्र ही रही मगर समय और परिस्थितियों के बदलने से महिला पुलिस की आवश्यकता महसूस होने लगी। भारत में सबसे पहले वर्ष 1942 में कानपुर में एक महिला पुलिस की टुकड़ी की तैनाती उस समय की गई जब वहां एक फैक्टरी में महिला मजदूरों व बच्चों ने हड़ताल कर दी थी। इसी तरह वर्ष 1973 में सबसे पहले तामिलनाडू में महिला पुलिस की भर्ती की गई। वर्ष 1973 में ही किरण बेदी अखिल भारतीय पुलिस सेवा की पहली महिला पुलिस अधिकारी बनी जो कि आजकल पाण्डुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर का काम देख रही हैं। धीरे- धीरे सभी राज्यों में महिला पुलिस की तैनाती की जाने लगी। आज हर थाना व चौकी में इनकी उपस्थिति को देखा जा सकता है।
यदि हम हिमाचल की बात करें तो, इस समय हिमाचल की बेटियां विभिन्न पदों पर आसीन हो कर अखिल भारतीय पुलिस की सेवाएं प्रदान कर रहीं हैं

इनमें मुख्यतः तिलोतमा वर्मा जो कि उत्तर प्रदेश काडर में अतिरिक्त पुलिस महानिदेक के पद पर तैनात हैं। इसी तरह सतवंत अटवाल त्रिवेदी, पुलिस महानिरिक्षक बीएसएफ दिल्ली पूरे विभाग के प्रशिक्षण का काम देख रही है। शालिनी अग्निहोत्री शिमला में सतर्कता विभाग, मोनिका पुलिस अधीक्षक चम्बा, आकृति शर्मा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कांगडा व रंजना चौहान पुलिस मुख्यालय में अपनी सेवाएं दे रही हैं।
यही नहीं हिमाचल पुलिस में बाहरी राज्यों से आकर भी महिला पुलिस अधिकारी विभिन्न पदों पर तैनात हो कर देश-प्रदेश की सेवा कर रही हैं। इनमें पुनीता भारद्वाज आईजी हैडकवाटर, रानी बिंदू चंडीगढ़ प्रशिक्षण केंद्र में डीआइजी तथा डीआइजी सुमेधा केन्द्र की प्रतिनियुक्ति पर हैं। इसी तरह वीना भारती नेशनल पुलिस अकादमी हैदराबाद में तथा सौम्या, शुभ्रा, अंजुम, साक्षी वर्मा विभिन्न वाहिनियों में कमांडेट के रूप में तैनात हैं। एक अन्य पुलिस महिला अधिकारी सृष्टि पांडे अपना व्यावसायिक प्रशिक्षण पूरा करने में जुटी हुई है।

उपरोक्त सभी आईपीएस महिला पुलिस अधिकारियों के अतिरिक्त हिमाचल पुलिस सेवा काडर की भी कई महिलाएं विभिन्न पदों पर तैनात होकर पूरी महिला पुलिस के लिए एक मिसाल बन कर उन्हें पुरूषों के समान अपनी ड्यूटी देने के लिए प्रेरित कर रही है।
“कोरोना” की इस मुश्किल घड़ी में सभी महिला कर्मचारी और अधिकारी सुबह से लेकर देर रात तक 12 घंटे से भी अधिक अपनी दैनिक ड्यूटी देकर एक मिसाल पैदा कर रही हैं। इन्हें अपने परिवार व समाज के प्रति दोहरा दायित्व निभाना होता है जिसे वे बखूबी अपना कर्म व धर्म समझ कर एक ओजस्विनी व तेजस्विनी बन कर निभा रही हैं। सुबह जब वे अपने घर से निकलती हे तो इनके बच्चे, छोटी बहनें या अन्य परिवार के सदस्य बडी संवेदनशीलता से निहारते हैं तथा अपना हाथ हिलाते हिलाते अपने कमरों में चले जाते हैं। इसी तरह यह विराांगनाएं ममता भरी अपनी नम आंखों से उन्हें बाय-बाय करती हुई अपने कर्तव्य निष्पादन के लिए निकल पड़ती हैं। यह ठीक है कि दूसरे विभागों विशेषतः स्वास्थ्य विभाग की महिलाएं भी पूरे समर्पण से कार्य कर रही है मगर महिला पुलिस कर्मचारियों की डगर निश्चित तौर पर चुनौतीपूर्ण है जिन्हें लगातार हाथ में डंडा व वाकी-टाकी इत्यादि लेकर धूप व छाया, ठंड या गर्मी में दूसरो की रक्षा हेतू एक रणचण्डी के रूप में कार्य करना होता हैं। उन्हें लोगों को कोरोना बीमारी के बारे में सचेत/जागरुक भी करना है तथा पीड़ित व्यक्तियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर क्वारन्टीन भी करना है

शरारती, बिगडैल युवाओं के साथ सख्ती के साथ भी पेश आना है। यही नहीं कहीं गरीब व असहाय लोंगों के लिए खाना भी परोसना है तो कई जगह तो महिला पुलिस कर्मी खुद अपने हाथों से खाना बनाकर लोंगो को बांटती हुई भी देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त कानून को क्रियान्वित करना, समाज की रक्षा तथा संवर्धन का दायित्व संभालना तथा गली कूचे में असामाजिक, अराजक व शरारती तत्वों से लेकर खूंखार अपराधियों से जूझना तथा मानवीय मूल्यों का ह्रास करने वालों को भी कानून के आगे जवाबदेह बनाना तो इनका दैनिक दायित्व है।

महिला पुलिस अपने स्थिर व गंभीर स्वभाव व कर्तव्यनिष्ठा से आम जनता की सेवा व सुरक्षा के लिए अपनी हर प्रकार की सुख सुविधाओं को त्याग कर अपने पुरूष सहकर्मियों के साथ कदम से कदम मिलाकर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही हैं। जो इस बात को प्रमाणित करता है कि नारी शक्ति के बिना एक सशक्त समाज की कल्पना करना बेमानी होता है। वह हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा कर एक व्यक्ति ही नहीं परंतु एक शक्ति के रूप में कार्य कर रही है।
“कोरोना” की इस जंग में नव विवाहित महिला पुलिस कर्मियों ने अपना हार- श्रृंगार परिधान त्याग कर व अपनी चूड़ियों की परवाह किए बिना अपने हाथों में विषाणु प्रतिरोधी दस्तानें व मुंह पर मास्क पहनकर डंडा- राइफल व अन्य जरूरी उपकरण लेकर अपनी बैल्ट कस कर एक कर्मयोगिनी बनकर अपने साहस व निर्भयता का निरंतर प्रमाण दिया हैं। उसका मन भी करता है कि फुरस्त के कुछ पल बिताउं। वह भी जानती है कि उसकी बिमार बच्ची ने व चारपाई पर पड़ी सासु- मां / माता ने दवाई नहीं ली होगी, मगर वह अपने कर्तव्य का एहसास ले कर तथा अपनी खाकी वर्दी से प्रेरणा लेकर हर मुश्किल का सामना करने में अपना दायित्व निभा रही है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब नारी शक्ति रानी झांसी का रूप लेकर युद्ध क्षेत्र में उतर जाती है तो दुराचारियों का अंत होना निश्चित हो जाता है। कोरोना नामक दैत्य का अंत भी महिला शक्ति के सहयोग व योगदान से ही अगामी कुछ दिनों में होना तय है।
पुलिस द्वारा विषम परिस्थितियों में भी लगातार ड्यूटी पर तैनात रहने की कार्यशैली को अब सरकार ने भी पहचान देनी आरंभ कर दी है क्योंकि उनके जलपान इत्यादि के लिए विशेष प्रावधान निश्चित किए गये हैं जो इनकी कार्यकुशलता बढ़ाने में निश्चित तौर पर सहायक सिद्ध होगें । सरकार भी जानती है कि यदि हम सभी को सुरक्षित रखने वाले खुद ही निराश व तनाव ग्रस्त रहेंगे तो वो कैसे अपना प्रदत दायित्व निभा पायेंगे। अब समय की पुकार है कि पुलिस कर्मियों को ज्यादा नहीं तो कम से कम बाकी विभागों के कर्मियों के अनुसार आठ वर्ष की बजाय तीन वर्ष में ही नियमित कर दिया जाए जिससे इनका मनोबल बढ़ेगा। वे अपने कार्य को और भी कर्मवीरता व निष्ठा के साथ करने में सबल, सक्षम व समर्थ बनेंगे। अमिताभ बच्चन की यह सुंदर पंक्तियां महिला पुलिस के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन कर उन्हें अपने कार्य में और भी दक्षता, प्रबलता व निष्ठा लाने के लिए सार्थक सिद्ध होंगी।


जो तुझसे लिपटी हैं बेड़ियां समझना इनको वस्त्र तू।
यह बेड़ियां पिघलाकर बना ले इनको शस्त्र तू ।
तू चल तुझे समय की भी तलाश है।
चरित्र जब पवित्र है तो क्यों है यह दशा तेरी।
यह पापियों को हक नहीं
कि ले परीक्षा तेरी ।
तू खुद की खोज में निकल तुझे समय की तलाश है।
जला कर भस्म कर उसे जो क्रू्रता का जाल है।
तू आरती की लौ नहीं -तू क्रोध की मशाल है।
तू चल तेरे वजूद की समय को भी तलाश है।
चुनर उडा के ध्वज बना-गगन भी कंपकंपाऐगा,
अगर तेरी चुनर गिरी तो एक भुकंप आयेगा।
तू किस लिए हताश है तू चल तुझे तेरे वजूद की समय को
भी तलाश है।


लेखक

राजेन्द्र मोहन शर्मा,

भा.पु.से. ( रिटायर्ड ) हिमाचल प्रदेश पुलिस विभाग

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