आतंकवाद का ‘फण’ व मीडिया का चाबुक

एप्पल न्यूज ब्यूरो

विश्व में आतंकवाद से जूझ रही दुनिया के सामने आज जिस तरह की उदासीनता व लाचारगी दिखाई दे रही है वैसी शायद कभी भी नहीं देखी गई होगी। मीडिया के सामने यह बहुत बड़ा प्रश्न है कि आतंकवाद की घटनाओं की किस तरह से प्रस्तुति की जाये, क्योंकि कई ऐसी प्रस्तुतियों को मीडिया के सिर थोप दिया जाता है जिसके लिए वह वास्तव में जिम्मेवार नहीं होता।

आज भारत में आतंकवाद कई रूपों में अपना फण  फैलाने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ पाक घोषित आतंकवाद तो वहीं दूसरी तरफ वैश्विक इस्लामी आतंकवाद जिसे अलकायदा हिजबुल मुजाहिदीन व तालीबानी जैसे संगठन घोषित कर रहें हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर व छतीसगढ़ राज्यों में चल रही वामपंथी रूझानों में रूचि रखने वाला नक्सल आतंक जिसने बाहरी खाल कुछ भी पहन रखी हो,  मगर वो भारतीय लोकतंत्र के विरोधी ही हैं। जब आतंकवाद का खतरा इतने रूपों में हो तो मीडिया की उलझने इसलिए बढ़ जाती हैं कि वह इसे किस रूप में प्रस्तुत करे। एक तरफ आतंकवाद के समाधान की दिशा में सामाजिक दबाव बनाने की चुनौती सामने होती है, दूसरी और इस बात का ध्यान भी रखना पड़ता है कहीं उसके प्रयासों के थोडे़ से भी विचलन से उसे भारतीय लोकतंत्र का विरोधी न मान लिया जाये।

यह बात भी सही है कि कई बार मीडिया ने आतंकवाद की फूहड़़ प्रस्तुतियां दी हैं जिससे देश के किसी विशेष समुदाय को प्रसन्न करने की कोशिश की गई तथा आरोप – प्रत्यारोप द्वारा अनावश्यक कीचड़ उछाल कर पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचाई। परंतु स्वाभिक है कि समाज के नैतिक पतन के इस दौर में मीडिया भी यहां इतना विश्वम-सुंदरम कहां रह गया है तथा मानवीय मूल्यों के हनन में सृजन और संतुलन करने वाला पत्र-समुदाय भी अंदर से खोखला, कुटिल, भीरू, कायर, लालची और भ्रष्ट महसूस होने लगता है। परंतु यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हर संकट के समय भारतीय मीडिया ने अपने देश का गौरव ऊंचा किया है तथा आतंकवाद के विरूद्ध अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की है। यह भी ठीक है कि जब कोई आतंकवादी घटना घटती है तो मीडिया को विभिन्न चैनलों में खबरों को प्रस्तुत करते की होड़ सी लग जाती है तथा कई बार घटनाओं को सनसनी पूर्ण बना दिया जाता है  तथा कई बार देश  में दंगे भी फैलने शुरू हो जाते हैं। आतंकवादी तो अपना प्रचार चाहते हैं तथा इसके लिए मीडिया उनका एक माध्यम बन जाता है। कई बार तो मीडिया को वो अपनी मर्जी से प्रसारण के लिए मजबूर भी करते रहते हैं तथा यदि कोई मीडिया तटस्थ होकर उनकी नंगी तस्वीर का प्रसारण करता है तो  उन्हें मारने की धमकियां आनी शुरू हो जाती हैं। वे एक भय की स्थिति पैदा करना चाहते हैं। वे चाहतें हैं कि हत्यांए चाहे कम हों मगर उसका प्रभाव अधिक हो। जब मीडिया उनकी घटनाओं को उनके मनमाने ढंग से प्रकाशन करना आरंभ कर देता है तो आतंकवाद अधिक फैलता है। 
पत्रकारिता के क्षेत्र में भी बहुत से ऐसे योद्धा हैं जिन्होनें अपना नाम हमेशा के लिए ऊंचा किया है तथा बाकी पत्रकारों को भी उनके नक्शेकदम पर चलने के लिए प्रेरित किया है। उदाहरण के तौर पर पंजाब केसरी के सम्पादक आदरणीयअमर शहीद लाला जगतनारायण व उनके सपुत्र श्री रमेश चंद ने अपनी लेखनी को झुकने नहीं दिया भले ही उनको अपने जीवन की आहुति देनी पडी़। समाज को ऐसे प्रगाढ़ व प्रगल्लव पत्रकारों पर नाज़ है तथा उनका नाम सदा ही सुनहरी अक्षरों में लिखा जाता रहेगा। 
इसी तरह हाल ही मे जी.टी.वी. के मुख्य संपादक श्री सुधीर चौधरी को भी आतंकवादी संगठनों से धमकियां इसलिए मिलनी शुरू हुई हैं, क्योंकि उन्होंने कश्मीर व पी.ओ.के. की वस्तु स्थिति के बारे में उचित रूप से प्रसारण किया। यही नहीं, हमारे ही देश के कुछ नागरिकों ने उसके विरुद्ध केरल राज्य में 295 आईपीसी के अंर्तगत मामला भी दर्ज करवा दिया। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि देश का हर सभ्य नागरिक ऐसे ‘‘कलम के वीर योद्धाओं’ के सर्मथन में आगे आए तथा देश में पनप रहे आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए अपना सहयोग प्रदान करे। मीडिया के लोगों को भी स्वंय अपनी आचार संहिता तैयार करनी चाहिए जिससे उनके प्रसारण द्वारा आतंकवादियों के हितों या लक्ष्यों की प्राप्ति न हो सके।
जिस तरह से सैनिक (सर्जिकल स्ट्राइक) द्वारा दुश्मनों के अड्डों को तबाह करते हैं वैसे ही कलम के वीर सिपाही आतंकियों का काला चेहरा समाज के सामने प्रस्तुत करते रहते हैं। वर्ष 1999 में हवाई जहाज़ के अपहरण में मीडिया ने अपनी महत्तवपूर्ण भूमिका निभाकर सभी अपहरण किए गये यात्रियों को छुड़वाया था। इसी तरह देश में जब भी कहीं आतंकी घटना घटती है मीडिया के लोग अपनी जान हथेली पर रख कर घटना स्थल पहुंच कर वहां के मंजर का पूरा विवरण हम तक पहुंचाते हैं तथा हमें ऐसी आसुरी शक्तियों के बारे में अवगत करवाते रहते हैं।  
मीडिया के लोग ऋषि नारद मुनि के वंशज माने गये हैं। श्री नारद जी हर देवता व हर राक्षस को उसके किए जाने वाले अच्छे या बुरे कार्य के दुष्परिणामों के बारे में सचेत किया करते थे। उसी प्रकार पत्रकार भी निश्चित सीमाओं के अंर्तगत समाज में घटित हो रही अच्छी या बुरी घटनाओं का प्रकाशन करके समाज के लोगों में जागृति लाने का प्रयास करते हैं। मीडिया तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है । स्वच्छ पत्रकारिता किसी पत्रकार की रिपोर्टिंग मात्र ही नहीं होती अपितु यह वह स्वतंत्र विदा है जो जनमत को एक नई दिशा व दशा प्रस्तुत करती हैं तथा जनता की आवाज़ को बुलंद कर आतंकवादी जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने का प्रयत्न करती हैं। 
यह भी देखा गया है कि जब मीडिया में राजनैतिक हस्तक्षेप बढ़ने लगता है तब मीडिया के लोग किसी राजनैतिक दल विशेष का भोंपू बन कर अपनी विश्वसनीयता खो बैठते हैं। आतंकवाद पूरे राष्ट्र की समस्या है जिससे निपटने के लिए सभी राजनैतिक दलों को एकजुट होने की अवयकता होती है मगर देखा गया कि राजनीतिज्ञ इस पर अपनी रोटियां सेकने से बाज़ नहीं आते। ऐसे में यदि कोई मीडिया अपना सही दायित्व न निभाए तो उस समय उत्तम आदर्श एक उज्जवल राह दिखाने वाले पत्रकारों पर भी चंद्रमा की तरह कलंक लग जाता है। 
समाज की रंगों में नवचेतना का संचार करने वाले मीडिया समुदाय का विशेष कर्तव्य बनता है कि ज्ञान के आलोक अपने हाथों में सधी हुई लेखनी लेकर तथा भावों और विचारों का अविरल सत्य प्रवाह कर, अनुभूतिपूर्ण एवं अनुभवगम्य सामान्य प्रकाशन ही नहीं अपितु चिरंतन मणि बन समाज कल्याण की पवित्र अभीप्सा में कटिबद्व हो कर एक दक्ष संगठन के रूप में हर संकट का धैर्य से मुकाबला करने में प्रेरित होकर सक्रिय, निष्पक्ष, पुलकित, स्वस्थ आदर्श वाले लौह- संकल्प देकर समाज की अमोघ रक्षापंक्ति बनाने में उल्लेखनीय योगदान दें, ताकि ‘‘सर्वेभवंन्तु सुखिनः’’ वाली वैदिक उक्ति अक्षरशः चरितार्थ हो सके।  

लेखक

RM शर्मा

IPS(सेवानिवृत्त DIG) हिप्र

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