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जुनिपर यानी धूप की नर्सरी एवं पौधरोपण तकनीक विकसित, शीत-मरूस्थल के वानिकीकरण में होगी महत्वपूर्ण भूमिका

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एप्पल न्यूज़, शिमला

जुनिपर (पेंसिल सिडार) उत्तर-पश्चिम हिमालयी क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण शंकुधारी वृक्ष है। भारत वर्ष में यह वृक्ष मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के किन्नौर एवं लाहौल और स्पीति जिले में और जम्मू-कश्मीर के गुरेज घाटी और लद्दाख क्षेत्र तथा उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है । वहाँ की स्थानीय भाषा  में  इसे शूर, शुक्पा, शुर्गु, लाशूक एवं धूप नाम से जाना जाता है।

हिमालयन  वन अनुसंधान संस्थान शिमला में आज़ादी के अमृत महोत्सव के तहत जूनिपर नर्सरी एवं पौधरोपण तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रम का  आयोजन किया गया । जिसमें  किन्नौर एवं लाहौल और स्पीति,  लद्दाख क्षेत्र से वन विभाग के लगभग 50 कर्मचारियों ने वर्चुयल रूप से भाग लिया। 

संस्थान के निदेशक डॉ॰ संदीप शर्मा ने बताया कि जूनिपर की नर्सरी एवं पौधरोपण तकनीक विकसित करने में सफलता पायी है और कहा कि पहले इसकी नर्सरी और  पौधरोपण नहीं थी, जिससे कारण वन विभाग पौधरोपण के लिए इसके पौधे तैयार नहीं कर पा रहा था, परंतु संस्थान द्वारा विकसित नर्सरी तकनीक से इसके पौधरोपण के द्वार खुल गए है ।

श्री पीतांबर नेगी ने इस  विषय पर विस्तृत व्यख्यान दिया । उन्होने बताया कि यह प्रजाति शीत मरुस्थल के लिए अति महत्वपूर्ण है । हिमाचल प्रदेश में जुनिपर के छह प्रजातियाँ है और लगभग 208 वर्ग  किलोमीटर पर इसके वन है, जो की बहुत कम है ।

  हिमाचल प्रदेश के किन्नौर और  लाहुल – स्पीति जिले तथा लद्दाख क्षेत्र में इस की लकड़ी का उपयोग घरों में जलाने के लिए किया जाता है, सुखी टहनियों और पत्तों का उपयोग घरों में, मंदिरों में, मठों और गोंपाओं में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान एवं पूजा के दोरान किया जाता है। इस का उपयोग “अमची” स्वास्थ्य प्रणाली में विभिन्न रोगों के इलाज के लिए भी किया जाता है।

जुनिपर की लकड़ी का उपयोग पेंसिल बनाने के लिए भी किया जाता है।  इस वृक्ष का प्राकृतिक पुनर्जनन इस के प्राकृतिक क्षेत्र में विभिन कारणों से बहुत कम है । इन के प्राकृतिक आवास में कम संख्या होने का दूसरा कारण इस के बीजों में पायी जानी वाली सुप्ततता भी है जिस के कारण इन के बीज अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी अंकुरित नहीं हो पाते हैं । अतः इसके बीजों की सुप्तावस्था को तोड़ने की विधि और नर्सरी तकनीक विकसित करने के लिए शोध की सिफारिश की गई थी।

संस्थान द्वारा जुनिपर के बीजों एवं नर्सरी तकनीक पर शोध कार्य करने के उपरांत इस के बीज प्रोद्योगिकी एवं नर्सरी तकनीक को पहली बार विकसित  करने में सफलता पायी । शीत शीत-मरूस्थल क्षेत्रों से  इसकी बहुत मांग आ रही है । अभी तक़ संस्थान नें 15000 पौधे वन विभाग और वहाँ के स्थानीय लोगों को वितरित किए है ।  यह प्रजाति शीत मरुस्थल वानिकरण योजना में महत्वपूर्ण होगी तथा क्षेत्र के लिए संजीवनी सावित हो सकती है ।

डॉ॰ जगदीश सिंह वैज्ञानिक एवं प्रभाग प्रमुख ने बताया कि संस्थान समय समय पर जूनिपर की नर्सरी और पौधरोपण की तकनीक पर वन विभाग के कर्मचारियों को प्रशिक्षण देता है, ताकि वन विभाग के लोग इसे उगा सके और पौधरोपण के लिए मांग पूरी की जा सके । उन्होनें औषधीय पौधों कृषिकरण द्वारा किसानों की आय वृद्धि पर विस्तार से व्याख्यान दिया । इस अवसर पर डॉ॰ जोगिंदर चौहान व स्वराज सिंह भी उपस्थित थे । 

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