वर्त्तमान शिक्षा प्रणाली… गुलामी का षड्यंत्र

एप्पल न्यूज़ ब्यूरो, शिमला
1858 में Indian Education Act. बनाया गया आज हमारी शिक्षा व्यवस्था इसी कानून पर आधारित है यह मैकोले नाम के अँगरेज़ ने बनायीं थी हमें गुलाम बनाने के लिए और हमारी महान सभ्यता और संस्कृति को नस्ट करने के लिए…..मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो भारत कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे,मैकाले का भूत आज सबसे अधिक प्रसन्न होगा, यह देखकर कि 179 साल पहले की गयी उसकी भविष्यवाणी सही साबित हुई।


मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है “कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी” इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया, और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा दी, उसमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला, सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं और हमारी शिक्षा व्यवस्था मकौले का वही Indian Education Act है………….अर्थात आज भी हमारे भारत में वही शिक्षा व्यवस्था चल रही है जो मैकोले ने हमें गुलाम बनने के लिए बनायीं थी और आज यही कारण है कि अपनी महान संस्कृति को हम स्वयं ही शिक्षा के नाम पर नस्ट करने में व्यस्त हैं…….और सच्चाई यही है कि हमारा अध्यात्म हमारी संस्कृति आज के विज्ञानं से अत्यधिक उच्च और सम्पन्न है आवश्यकता है तो उसे अपनाने की और मैकोले के षड़यंत्र को विफल करने की……!यह तभी संभव है जब हम इस Indian educational act के षड़यंत्र को नस्ट कर पायें…………”गुरुकुल” के बारे में बहुत से लोगों को यह भ्रम है की वहाँ केवल संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी जो की गलत है यह Indian Education Act द्वारा फैलाया गया भ्रम है । 1820 में विलियम एडम नाम का एक अँगरेज़ आया था……उसने पुरे भारत का सर्वे कराया और ब्रिटिश संसद में 1117 पन्ने की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की उस रिपोर्ट के अनुसार भारत में गुरुकुल भारत की शक्ति और समृद्धि का मुख्य आधार है भारत में विज्ञान की 20 से अधिक शाखाएं रही है जो की बहुत पुष्पित पल्लवित रही है जिसमें प्रमुख १. खगोल शास्त्र २. नक्षत्र शास्त्र ३. बर्फ़ बनाने का विज्ञान ४. धातु शास्त्र ५. रसायन शास्त्र ६. स्थापत्य शास्त्र ७. वनस्पति विज्ञान ८. नौका शास्त्र ९. यंत्र विज्ञान १०. astrophysics ११.चिकित्सा विज्ञानं आदि इसके अतिरिक्त 20 अन्य विषयों कि भी शिक्षा समृद्ध रूप से गुरुकुलों में दी जाती हैं। संस्कृत भाषा मुख्यतः माध्यम के रूप में, उपनिषद एवं वेद छात्रों में उच्चचरित्र एवं संस्कार निर्माण हेतु पढ़ाए जाते हैं। (विलियम एडम के 1117 पन्ने की रिपोर्ट में भारत के विश्वविख्यात उच्चविज्ञान तकनीक को प्रमाणित करने वाले पर्याप्त उदहारण उपलब्ध हैं यहाँ सभी का वर्णन करना सभव नहीं)
थोमस मुनरो सन 1813 के आसपास मद्रास प्रांत के राज्यपाल थे, उन्होंने अपने कार्य विवरण में लिखा है मद्रास प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण आंद्रप्रदेश, पूर्ण तमिलनाडु, पूर्ण केरल एवं कर्णाटक का कुछ भाग ) में 400 लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। उत्तर भारत (अर्थात आज का पूर्ण पाकिस्तान, पूर्ण पंजाब, पूर्ण हरियाणा, पूर्ण जम्मू कश्मीर, पूर्ण हिमाचल प्रदेश, पूर्ण उत्तर प्रदेश, पूर्ण उत्तराखंड) के सर्वेक्षण के आधार पर जी.डब्लू.लिटनेर ने सन1822 में लिखा है, उत्तर भारत में 200 लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। माना जाता है की मैक्स मूलर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक शोध किया है, वे लिखते है “भारत के बंगाल प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण बिहार, आधा उड़ीसा, पूर्ण पश्चिम बंगाल, आसाम एवं उसके ऊपर के सात प्रदेश) में 80 हज़ार से अधिक गुरुकुल है जो कि कई सहस्त्र वर्षों से निर्बाधित रूप से चल रहे है”।
उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के आकडों के कुल पर औसत निकलने से यह ज्ञात होता है की भारत में 18 वी शताब्दी तक 300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल था। एक और चौकानें वाला तथ्य यह है की 18वी शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ थी, 300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल के अनुसार भारत में 7लाख 32 हज़ार गुरुकुल होने चाहिए। अब रोचक बात यह भी है की अंग्रेज प्रत्येक दस वर्ष में भारत में भारत का सर्वेक्षण करवाते थे उसे के अनुसार 1822 के लगभग भारत में कुल गांवों की संख्या भी लगभग 7 लाख 32 हज़ार थी, अर्थात प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल(1834 में मेकॉले के सर्वेक्षण में ऐसे ही तथ्य सामने आते हैं) 16 से 17 वर्ष भारत में प्रवास करने वाले शिक्षाशास्त्री लुडलो ने भी 18वी शताब्दी में यहीं लिखा की “भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं जिसमें गुरुकुल नहीं एवं एक भी बालक ऐसा नहीं जो गुरुकुल जाता नहीं”।
राजा की सहायता के बिना, समाज से पोषित इन्ही गुरुकुलों के कारण 18वी शताब्दी तक भारत में साक्षरता 97%थी, बालक के 5 वर्ष, 5 माह, 5 दिवस के होते ही उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था। प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक विद्यार्जन का क्रम 14 वर्ष तक चलता था। जब बालक सभी वर्गों के बालको के साथ निशुल्कः 20 से अधिक विषयों का अध्ययन कर गुरुकुल से निकलता था, तब आत्मनिर्भर, देश एवं समाज सेवा हेतु सक्षम हो जाता था।इसके उपरांत विशेषज्ञता (पांडित्य) प्राप्त करने हेतु भारत में विभिन्न विषयों वाले जैसे शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद, धातु कर्म आदि के विश्वविद्यालय थे, नालंदा एवं तक्षशिला तो 2000 वर्ष पूर्व के है परंतु मात्र 150 -170 वर्ष पूर्व भी भारत में 500-525 विश्वविद्यालय थे।
मैकोले 1834 के आस पास भारत आया था …….भारत कि आध्यात्मिक सांस्कृतिक सामाजिक व्यवस्था से वह अत्यंत प्रभावित था उसके सर्वे के रिपोर्ट भी उपलब्ध हैं और आश्चर्यजनक हैं छोटा सा अंश प्रस्तुत करूँगा 2 Feb 1835 में ब्रिटिश पार्ल्यामेंट में दिया गया उसका भाषण “I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a
beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this
country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and
cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and
English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation”……..थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले) कई वर्षों भारत में यात्राएँ एवं सर्वेक्षण करने के उपरांत समझ गया की अंग्रेजो पहले के आक्रांताओ अर्थात यवनों, मुगलों आदि भारत के राजाओं, संपदाओं एवं धर्म का नाश करने की जो भूल की है, उससे पुण्यभूमि भारत को पराधीन बनाना असंभव है, अपितु संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश करे तो इन्हें पराधीन करने का स्वप्न पूर्ण हो सकता है। इसी कारण “इंडियन एज्यूकेशन एक्ट” बना कर समस्त गुरुकुल बंद करवाए गए। हमारे शासन एवं शिक्षा तंत्र को इसी लक्ष्य से निर्मित किया गया ताकि नकारात्मक विचार, हीनता की भावना, जो विदेशी है वह अच्छा, बिना तर्क किये रटने के बीज आदि बचपन से ही बाल मन में घर कर ले और अंग्रेजो को प्रतिव्यक्ति संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश का परिश्रम न करना पड़े।
मैकोले द्वारा British Parliament में दिए गए भाषण का प्रमाण

हमारे वेद पुराण उपनिषद एवं सभी धार्मिक ग्रन्थ आज भी भारत के अध्यात्म और भारत की वैज्ञानिक श्रेष्ठता को दर्शाते हैं किन्तु हमें उन सब से दूर रखा गया है कारण क्या है हमारी वर्तमन शिक्षा व्यवस्था अर्थात मैकॉले का बनाया Indian educational act 1858 हमारी संस्कृति को ढोंग और पाखंड बताता है और दुर्भाग्य यह है की हमने मान भी लिया है मैकोले अपने षड़यंत्र में सफल हुआ है और हम सब कुछ जानते बुझते भ्रम में है पूर्ण रूप से आज भी उसके गुलाम……..
मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमे वो लिखता है कि “इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी और भारत शारीरिक रूप से आजाद होने पर भी मानसिक रूप से हमेशा हमारा गुलाम बना रहेगा”
और आज मैकोले कि लिखी चिट्टी कि सच्चाई सामने दिख रही है हमारे भारत में……….अंत में पुन: मेकौले का वह कथन लिख रहा हूँ……
कुछ जीत ऐसी होती हैं जिन पर कभी आंच नहीं आती। यह ऐसा साम्राज्य है जिसे कोई समाप्त नहीं कर सकता। यह अविनाशी साम्राज्य अँग्रेजी भाषा, कला और कानून का है।”हमें अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार के लिए एक ऐसा वर्ग बनाना है जो अपनी जड़ों से घृणा करे। वे लोग रंग व रक्त से हिंदुस्तानी होंगे किन्तु आचार-व्यवहार में अंग्रेज़ होंगे।”
यही सच आज हमारे सामने है हम पूरी तरह काले अंग्रेज़ बनते जा रहे है !!
15 अगस्त 1947 से पूर्व हम गुलामी का विरोध करते थे आज हम गुलामी का सम्मान करते हैं……
प्रश्न केवल इतना है यह गुलामी कब तक रहेगी कब तक हम अपनी महान संस्कृति और सभ्यता का अपमान करते रहेंगे……….जो शिक्षा व्यवस्था हमें गुलाम बनाने के लिए बनायीं गयी है कब तक उसे अपनाकर हम गुलाम बने रहेंगे………..कब तक अपमान करते रहेंगे अपने शहीदों का….. उनके सपनों का?
तुम न समझो हर कली इस बाग़ की स्वाधीनता यूँ ही मिली है
हर कली इस बाग़ की कुछ खून पीकर ही खिली है
बिछ गए वे नीव में दिवार के निचे गड़े हैं
ये महल अपने शहीदों के चिताओं पर खड़े हैं…………?
जय हिंद जय भारत वन्दे मातरम………..!

लेखक

डॉ मामराज पुंडीर
विशेष कार्य अधिकारी
शिक्षा मंत्री हिमाचल सरकार

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