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देखा नहीं ऐसा मंजर…..!

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एप्पल न्यूज़, शिमला
हादसे के तुरंत बाद कोई टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं होती l ऐसे आघातों को पचाने में समय लगता है l
जनबस्ती से दूर, जंगल में साधु लोग रहते थे l ऐसे ही बाघोँ से भरे जंगल में सन 1817 में स्काच अधिकारिओं ने मझोले से गाँव में एक साधु देखा जो राहगीरों को पानी पिलाता था।

गोरखा सैनिकों ने भी लगभग इसी समय यह गाँव खोजा जो घने जंगल और जानवरों से भरा था, आज वह बाघोँ भरा जंगल शिमला है। शुरू में शिमला की जनसंख्या चौबीस हजार थी जिसके लिए माकूल इंतजमात किए गए।
1965 में शिमला आया तो शिमला एक शांत और सोया हुआ शहर था।
ऐसे ही 1979-80 में मैंने जंगल के नीचे एक बाऊड़ी देखी जहाँ एक साधु रहता था l यहां कोई मंदिर नहीं था l बाऊड़ी के साथ एक छोटे से पत्थर को शिव माना जाता था l कोई सड़क या ढंग का रास्ता भी नहीं था।

इधर के लोग जंगल के इस और मृतक के घर दस दिन जलाए जाने वाले दिये की बाती तड़के अँधेरे में जलाने आते थे l जंगल में डर के मारे आगे तक ना जा कर जंगल के शुरू में ही जल्दी से यह कर्म कर भागने की रहती l या मृतक के दस दिन बाद शुद्धिकरण हेतु “कप्पड़ धुलाई” के दिन कपड़े धोने व हजामत करवाने, नहाने आते थे l तभी एक बार मैं भी गया था।
गहरे नाले के बीच, जहां ऊपर तक लंबे ऊँचे देवदार के पेड़ थे, लगातार पानी चला रहता l यह जगह निश्चित रूप से डरावनी थी l
बादल फटने पर या वैसे भी पानी का बहाव दो पहाड़ों के बीच बनी खाई या नाले से ही बनता है l ज्यादा ऊंचाई हो तो बहाव और तेज़ हो जाता है जो आसपास के पेड़ पत्थरों को समेट तेज और तेज होता जाता है l
पिछले 20-22 बरसों में जाने कैसा परिवर्तन हुआ कि इस सुनसान जगह पर मंदिर बन गया, पुजारी रात को भी रहने लगे l सराय बन गई l सुबह सात बजे से पहले ही इतने सारे लोग बाल बच्चों के साथ इकट्ठा हो गए।
सुबह सवेरे ही इंस्टिट्यूट के पहाड़ के हिल कर खिसकने को दैविक प्रकोप चाहे कह लें, या एक प्राकृतिक दुर्घटना कहें जिसने कितने मासूमों को अप्राकृतिक मौत दे दी l
हिमाचल में लगातार ऐसी दुर्घटनाएं हो रही थीं l शिमला अब तक बचा हुआ था l जब तीन दिन की लगातार बारिश के बाद शिमला शहर के आसपास जब लगातार जमीन खिसकने लगी तो लोग दहशत के मारे सो नहीं पाए।

रातों को जग कर लोग टॉर्च की रोशनी से आसपास देखने की कोशिश करने लगे l अपना घर गिरे तो गिरे, कहीं दूसरे का घर अपने ऊपर न आ जाए! ऊपर तक चार मंजिले घरों की कतारें हैं l ऊपर से पड़ोसी नींव को लगातार पानी से सींच रहे हैं l
लाल पानी के नीचे सलोटर हॉउस गिरा तो नीचे नए बने घर को भी साथ ले गया l कई जगह ईमारतोँ की नींव हिल गई, कहीं जमीन धंसने लगी।
परिवार के परिवार तो गए ही, सबसे ज्यादा दुःखद, पीड़ादायक और ह्रदय विदारक मासूमों का जाना रहा l
पोती अक्सर जिक्र करती थी कि उसकी एक फ़्रेंड समरहिल में रहती है।

पहले भी वह उसकी बात करती थी क्योंकि वह बाकी फ्रेंडज के बजाय दूर थी l दुर्भाग्यवश यही फ्रेंड और उसकी बहन इस हादसे का शिकार हुई l यह घटना बहुत ही त्रासद थी l बच्चोँ को ऐसे हादसों से अनभिज्ञ रखना इस युग में संभव नहीं रहा।
स्मार्ट सिटी के चक्कर में सड़कों के साथ बिना जरूरत के स्टील के ढांचे चिपका दिए, अंग्रेजोँ के समय के मजबूत रेलिंग तोड़ कच्चे खड़े कर दिए, नालों पार्किंग और बड़ी बिल्डिंगें ख़डी कर दीं, फोर लेन के शो में पहाड़ियां, पेड़ काट दिए।
तथाकथित विकास, प्रसार- प्रचार ने न जाने किस मुकाम पर हमें ला पटका है…!!

साभार

श्री सुदर्शन वशिष्ट जी की फेसबुक वॉल से

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