नहीं रहे प्रख्यात शिल्पकार, साहित्यकार और मनोविज्ञान के विद्वान प्रो. एमसी सक्सेना, 93 वर्ष की आयु में अनंत यात्रा को रवाना

एप्पल न्यूज़, शिमला
शिमला की पहचान ‘हिम बाला’ सहित देश-विदेश में सैकड़ों मूर्तियों और म्यूरल का किया सृजन; कला, साहित्य और मनोविज्ञान के क्षेत्र में छोड़ी अमिट छाप
शिमला। देश के प्रख्यात शिल्पकार, साहित्यकार, चित्रकार और मनोविज्ञान के विद्वान प्रोफेसर एमसी सक्सेना का 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने रविवार शाम करीब चार बजे शिमला में अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन से कला, साहित्य, शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र में शोक की लहर है। उनका जीवन बहुआयामी प्रतिभा, सृजनशीलता और ज्ञान के प्रति समर्पण का प्रतीक रहा। उन्होंने अपनी कला और साहित्य के माध्यम से हिमाचली संस्कृति को नई पहचान देने के साथ-साथ देश की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया।
प्रो. सक्सेना की पहचान केवल एक शिल्पकार के रूप में नहीं थी, बल्कि वह एक संवेदनशील साहित्यकार, कुशल चित्रकार, मनोवैज्ञानिक और शिक्षाविद् भी थे। शिमला की प्रसिद्ध कलाकृति ‘हिम बाला’ सहित देश-विदेश में स्थापित उनकी सैकड़ों मूर्तियां और म्यूरल उनकी असाधारण कलात्मक प्रतिभा के साक्षी हैं। पत्थर को आकार देकर उसमें भावनाओं और विचारों को जीवंत कर देना उनकी कला की विशिष्ट पहचान थी। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति, मानवीय संवेदनाओं, प्रकृति और जीवन-दर्शन की गहरी झलक देखने को मिलती है।


शाहजहांपुर में हुआ जन्म, लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की शिक्षा
प्रो. एमसी सक्सेना का जन्म वर्ष 1934 में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से चिकित्सा मनोविज्ञान में एमए की शिक्षा प्राप्त की और परामनोविज्ञान पर शोध कार्य किया। कला के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें मूर्तिकला और चित्रकला के क्षेत्र में भी विशिष्ट पहचान दिलाई। उन्होंने लखनऊ के राजकीय कला महाविद्यालय से मूर्तिकला में डिप्लोमा प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में भी चित्रकला का अध्ययन किया।
कला, मनोविज्ञान और साहित्य का यह अनूठा संगम उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता था। मनुष्य के मन, व्यवहार और भावनाओं की गहरी समझ ने उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति को भी समृद्ध किया। यही कारण था कि उनकी कलाकृतियां केवल दृश्य सौंदर्य तक सीमित नहीं रहती थीं, बल्कि उनमें विचारों और संवेदनाओं की भी प्रभावशाली अभिव्यक्ति होती थी।
पत्रकारिता से अध्यापन तक का सफर
प्रो. सक्सेना का व्यक्तित्व विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ था। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी सेवाएं दीं और उत्तर प्रदेश के लखनऊ से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र ‘पायनियर’ में सह-संपादक के रूप में कार्य किया। पत्रकारिता से जुड़े रहने के दौरान उन्होंने सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों को समझने का अवसर प्राप्त किया।


इसके बाद उन्होंने राजकीय कला महाविद्यालय, शिमला में मनोविज्ञान एवं मूर्तिकला के प्राध्यापक के रूप में सेवाएं दीं। वह राजकीय कन्या महाविद्यालय, शिमला में मूर्तिकला विभाग के अध्यक्ष भी रहे। अध्यापन के माध्यम से उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को कला की बारीकियों से परिचित करवाया और उनमें रचनात्मकता को विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
साहित्य में भी रहा उल्लेखनीय योगदान
प्रो. एमसी सक्सेना की प्रतिभा मूर्तिकला और चित्रकला तक सीमित नहीं थी। साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने दो कहानी संग्रह और एक लघु उपन्यास की रचना की। कला, साहित्य और मनोविज्ञान से संबंधित उनकी लगभग 500 रचनाएं देश की विभिन्न भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। इसके अतिरिक्त उन्होंने कला से संबंधित मनोवैज्ञानिक शोधकार्य भी किया।
हिंदी और अन्य भाषाओं में साहित्यिक अभिव्यक्ति के माध्यम से उन्होंने समाज, संस्कृति और मानवीय व्यवहार के विविध पहलुओं को सामने रखा। उनकी लेखनी में भी वही संवेदनशीलता दिखाई देती थी, जो उनकी मूर्तियों और चित्रों में अभिव्यक्त होती थी।
देश-विदेश में स्थापित हैं उनकी कलाकृतियां
प्रो. सक्सेना की कलाकृतियों का विस्तार हिमाचल प्रदेश से लेकर देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों तक रहा। उनकी मूर्तियां और चित्र दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के मुंबई क्षेत्र, पंजाब के पटियाला, हिमाचल प्रदेश के नाहन, पांवटा साहिब, तत्तापानी, सुन्नी और जुब्बल सहित विभिन्न स्थानों पर स्थापित हैं। सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों के परिसरों में भी उनकी कलाकृतियों को स्थान मिला।


विदेशों में भी इराक, अमेरिका, फ्रांस और हॉलैंड जैसे देशों में उनकी कलाकृतियां स्थापित होने का उल्लेख उनकी उपलब्धियों में मिलता है। इस प्रकार उनकी कला ने भौगोलिक सीमाओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।
शिमला की ‘हिम बाला’ उनकी कलात्मक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनकी मूर्तियों में स्थानीय संस्कृति, प्राकृतिक परिवेश और मानवीय भावनाओं का ऐसा संयोजन देखने को मिलता है, जो दर्शकों को सहज ही आकर्षित करता है। हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करने में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा।
पुरस्कारों और सम्मानों से हुए सम्मानित
कला, साहित्य और मनोविज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान को विभिन्न संस्थाओं ने सम्मानित किया। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से मूर्तिकला एवं चित्रकला के लिए सम्मान मिला। इसके अतिरिक्त जेम्स द्वारा कला एवं मनोविज्ञान के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित किए जाने का उल्लेख भी उनकी उपलब्धियों में शामिल है। शिमला रोटरी क्लब ने उन्हें परामनोविज्ञान के क्षेत्र में सम्मान प्रदान किया। उन्हें हिमाचल प्रदेश में रंगमंच से संबंधित सम्मान तथा सर्वश्रेष्ठ कलाकार पुरस्कार से भी नवाजा गया।
राष्ट्रीय स्तर पर भी उनके कला-साहित्य संबंधी योगदान को पहचान मिली। कला और साहित्य पर आधारित दूरदर्शन की फिल्मों के माध्यम से उनके व्यक्तित्व तथा कार्यों को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाया गया। जालंधर-शिमला और दिल्ली से प्रसारित कार्यक्रमों में भी उनकी कला और विचारों को स्थान मिला।


कला को आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत मानते थे
प्रो. एमसी सक्सेना कला को केवल वर्तमान समय की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भविष्य के लिए सुरक्षित की जाने वाली सांस्कृतिक धरोहर मानते थे। उनका विश्वास था कि मनुष्य का जीवन नश्वर है, लेकिन उसके द्वारा किया गया सृजन सदियों तक जीवित रह सकता है। वह हिमाचली संस्कृति और परंपराओं को आगे बढ़ाने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।
उनका जीवन-दर्शन इन शब्दों में व्यक्त होता था—
“सब नश्वर है, मैं नहीं रहूंगा, लेकिन हजारों साल बाद भी जब खंडहरों से अवशेष के रूप में ये पाषाण मूर्तियां निकलेंगी, तो वो पीढ़ी आज को समझ सकेगी।”
उनके ये शब्द उनकी दूरदर्शी सोच और कला के प्रति गहरे विश्वास को दर्शाते हैं। वह मानते थे कि कलाकृतियां अपने समय के समाज, उसकी संस्कृति और जीवनशैली का दस्तावेज होती हैं। आने वाली पीढ़ियां इनके माध्यम से अपने अतीत को समझ सकती हैं।
कई राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और गणमान्य व्यक्ति रहे प्रशंसक
प्रो. सक्सेना की कला और उनके व्यक्तित्व से देश के कई राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, राजनेता, वरिष्ठ अधिकारी और अन्य गणमान्य व्यक्ति प्रभावित रहे। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाई। वह कला के माध्यम से समाज से संवाद स्थापित करने में विश्वास रखते थे और अपने कार्यों को जनमानस से जोड़कर देखते थे।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह रही कि उन्होंने अपनी कला को केवल प्रदर्शनी और संग्रहालयों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सार्वजनिक स्थलों पर मूर्तियों और म्यूरल के माध्यम से उसे आम लोगों के जीवन का हिस्सा बनाया।
आज अनंत यात्रा पर होंगे रवाना
प्रो. एमसी सक्सेना की अंतिम यात्रा आज शिमला के तारा हॉल स्थित उनके आवास फरवुड से निकाली जाएगी। इसके बाद अनाडेल में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा, जहां वह पंचतत्त्व में विलीन होंगे।
उनका निधन कला, साहित्य, शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपने जीवन में अनेक भूमिकाएं निभाईं, लेकिन हर भूमिका में सृजनशीलता, संवेदनशीलता और ज्ञान के प्रति समर्पण को सर्वोपरि रखा।
प्रो. एमसी सक्सेना भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पत्थरों में उकेरी गई उनकी कल्पनाएं, साहित्य में अभिव्यक्त उनके विचार और हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा। उनकी कलाकृतियां उनके उस विश्वास को जीवित रखेंगी कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसका सृजन आने वाली पीढ़ियों से संवाद करता रहता है।

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