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हाई कोर्ट ने हिमाचल सरकार पर लगाया पांच लाख “हर्जाना”, CS सेवा विस्तार पर नहीं दिया जवाब

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एप्पल न्यूज, शिमला
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना को दिए गए सेवा विस्तार के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर समय पर उत्तर न देने के कारण राज्य सरकार पर ₹5 लाख का हर्जाना लगाया है। कोर्ट ने यह राशि 25 जून तक हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पास जमा करवाने के आदेश दिए हैं।

यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने दिया। कोर्ट ने साथ ही यह भी निर्देश दिए कि हिमाचल प्रदेश रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण (HP-RERA) के अध्यक्ष और सदस्य की नियुक्ति की अधिसूचना भी 25 जून तक जारी की जाए।

जनहित याचिका अतुल शर्मा द्वारा दायर की गई है, जिसमें 28 मार्च 2025 को जारी उस आदेश को रद्द करने की मांग की गई है, जिसके तहत प्रबोध सक्सेना को 30 सितंबर 2025 तक छह महीने का सेवा विस्तार दिया गया है।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि:

21 अक्टूबर 2019 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने प्रबोध सक्सेना के खिलाफ दायर CBI आरोपपत्र का संज्ञान लिया था।

23 जनवरी 2025 को CBI ने पुष्टि की कि उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा अब भी लंबित है।

इसके बावजूद, उन्हें सेवा विस्तार दे दिया गया और उनका नाम “संदिग्ध सत्यनिष्ठा” की सूची में शामिल नहीं किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 123 और प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन है।

नियमों का उल्लंघन

प्रार्थी का आरोप है कि सेवा विस्तार देने से पहले सरकार ने आवश्यक रूप से:

CVC (केंद्रीय सतर्कता आयोग)

राज्य सतर्कता विभाग

DOPT (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग)

से अनिवार्य परामर्श नहीं लिया, जिससे DOPT के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हुआ। संसदीय समिति भी इस तरह के मामलों में सेवा विस्तार के दुरुपयोग पर चिंता जता चुकी है।

HP-RERA की नियुक्तियों पर भी फटकार

कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार HP-RERA अध्यक्ष व सदस्य की नियुक्ति टालती रही है। पहले मुख्यालय को धर्मशाला स्थानांतरित करने की बात कही गई, फिर नियुक्ति पर विचाराधीन प्रक्रिया का हवाला दिया गया, जबकि वास्तव में यह केवल टालमटोल की नीति है।

मामले पर अगली सुनवाई 25 जून 2025 को होगी, जिस दिन कोर्ट याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई अंतरिम राहत (सेवा विस्तार पर रोक) पर विचार करेगा।

यह मामला प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। कोर्ट की सख्ती यह दर्शाती है कि अब शासन में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका निर्णायक भूमिका निभा रही है।

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