एप्पल न्यूज़, शिमला
हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनाव समय पर करवाने संबंधी हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है।
इससे प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बन गई है।
दरअसल, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि प्रदेश में पंचायतों और अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव संवैधानिक समय-सीमा के भीतर कराए जाएं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि किसी भी परिस्थिति में लोकतांत्रिक संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनावों को टाला नहीं जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि प्राकृतिक आपदा या प्रशासनिक कठिनाइयों को संविधान से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
हाईकोर्ट ने सरकार को संकेत दिए थे कि पंचायत चुनावों की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाए और यदि संभव हो तो 30 अप्रैल 2026 तक चुनाव पूरे कर लिए जाएं। इस आदेश के बाद राज्य सरकार पर चुनाव कराने का दबाव बढ़ गया था।
हालांकि, हिमाचल प्रदेश सरकार का कहना है कि वर्तमान हालात में पंचायत चुनाव कराना व्यावहारिक रूप से कठिन है। सरकार ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि प्रदेश हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं से बुरी तरह प्रभावित रहा है।
कई क्षेत्रों में सड़कें, भवन और अन्य बुनियादी ढांचा अभी पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया शुरू करने से प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
क्योंकि प्रदेश में पहले से ही डिजास्टर एक्ट लागू है तो ऐसे में इस एक्ट के क्या मायने है, इस बारे में कोर्ट आदेशों में कुछ भी स्पष्ट नहीं है.
सरकार का यह भी कहना है कि हाईकोर्ट ने जमीनी हालात को पूरी तरह ध्यान में रखे बिना फैसला सुनाया है। इसलिए राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, ताकि चुनावों की समय-सीमा पर पुनर्विचार किया जा सके।
इस मामले का सीधा असर प्रदेश की करीब 3,500 से अधिक पंचायतों पर पड़ रहा है, जिनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है या शीघ्र समाप्त होने वाला है।
वर्तमान में कई पंचायतों में प्रशासकीय व्यवस्था के तहत कामकाज चलाया जा रहा है, लेकिन विपक्ष इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहा है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार जानबूझकर पंचायत चुनाव टालना चाहती है, क्योंकि उसे चुनावी नुकसान का डर है। वहीं सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे केवल प्रशासनिक और कानूनी मजबूरी बता रही है।
अब इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई निर्णायक मानी जा रही है। अदालत यह तय करेगी कि हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा या सरकार को पंचायत चुनावों के लिए अतिरिक्त समय दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही यह स्पष्ट होगा कि हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव कब और किस तरह कराए जाएंगे।
फिलहाल, पूरे प्रदेश की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह फैसला राज्य की जमीनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की दिशा तय करेगा।







