अंतराष्ट्रीय कुल्लु का दशहरा- राजा ने भगवान को समर्पित की राजगद्दी, सामाजिक एकीकरण का प्रतीक

शर्मा जी, अप्पले न्यूज़ कुल्लू

कुल्लू का दशहरा पर्व परंपरा, रीतिरिवाज और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा सबसे अलग और अनोखे अंदाज में मनाया जाता है। यहां इस त्योहार को दशमी कहते हैं तथा आश्विन मास की 10 को इसकी शुरुआत होती है। जब पूरे भारत में विजयादशमी की समाप्ति होती है उस दिन से कुल्लू की घाटी में इस उत्सव का रंग और भी अधिक बढ़ने लगता है।

कुल्लु का दशहरा आज अंतराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। इस दशहरे की परम्परा से पता चलता है कि यहां के राजा ऐसे भी हुए जिन्होंने अपनी गद्दी को ही भगवान को समर्पित कर दिया। स्वयं सेवक या छड़ीबरदार बनकर उनकी सेवा में तत्पर हो गये। यह उत्सव प्राचीन परम्परा और नये सामाजिक बदलावों की समाविष्ट संस्कृति का निदर्शन करवाता है। यह प्राचीन संस्कृति पर आधारित है जिसकी वर्तमान जीवन में अपनी प्रासंगिकता है।

कुल्लवी नाटी से संस्कृति और सामाजिक चेतना का संदेश

अंतराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा एक ऐसा पर्व है जहां पर समग्र भारतीय एकत्व के दर्शन मिलते हैं। यह पर्व प्राचीनता और नवीनता को समाविष्ट करते हुए सामाजिक एकीकरण प्रतीक भी है। इसमें समाज के धर्म और परम्परा से जुड़े लोग, व्यापार से जुड़े लोग और आम भारतीय जनमानस एकरूप नजर आता है। अंतराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में 2014 से नाटियों के द्वारा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, कुपोषण को दूर करना और आसपास लोगों को स्वच्छता के लिए प्रेरित करने के सामाजिक संदेश भी दिये गये। दशहरा उत्सव में पिछले पांच से छह सालों से कुल्लू की पारम्परिक नाटी का अयोजन किया जा रहा हैं नाटी का सबसे आकर्षक दृश्य 2014 और 2015 को दशहरा उत्सम में देखने को मिला था। यहां 6000 और 9800 महिलाओं ने संयुक्त रूप से ढोल नगाड़ों की थाप पर नाटी डालकर रचा था। दशहरा उत्सव की बैठक में नाटी उत्सव को बंद करवाने पर विचार किया जा रहा था। इसके बाद इसके बाद घोर विरोध के बाद नाटी को नियमित रूप से जारी रखने की सहमति बनी। गौरतलब है कि नाटी स्वच्छता और पोषण को लेकर की गयी थी जिसमें करीब चार हजार महिलाओं ने एक साथ नाटी और स्वच्छता और पोषण का सन्देश दिया ताकि देश स्वच्छ और कुपोषण मुक्त हो।

रघुनाथ का कुल्लू आगमन का इतिहास और दशहरा परम्परा

कुल्लू में रघुनाथ जी का मंदिर राजा जगतसिंह के शासनकाल की देन है जिनका शासनकाल का समय 1637-62 ई. का है। 1637 ई. में उन्होंने कुल्लू की राजगद्दी को संभाला। एक बार इनके राज्य के एक गांव टिपरी के रहने वाले ब्राह्मण परिवार ने अपने रिश्तेदार ब्राह्मण दुर्गादत की झूठी शिकायत कर दी। शिकायत में दावा किया गया कि ब्राह्मण के पास एक पत्था यानि लगभग एक किलोग्राम सुच्चे मोती हैं। राजा शिकायतकर्ता की बातों में आ गये। बाद में ब्राह्मण ने परिवार सहित आत्मदाह कर दिया था। राजा को अपने किये पर भारी पश्चाताप हुआ। इसके बाद राजा को गंभीर बीमारी हो गयी जिसके कारण वह वैष्णव सम्प्रदाय के सिद्ध महात्मा कृष्णदास पयहारी की शरण में चले गये। महात्मा जी ने उनके रोग का निवारण करके उनको नृसिंह भगवान की मूर्ति प्रदान की। राजा ने अपनी गद्दी पर भगवान नृसिंह को स्थापित किया और स्वयं एक छड़ीबदार के रूप में सेवा करने लगे। राजा को महात्मा ने अवध यानि आज की अयोध्या से त्रेतानाथ मंदिर से श्रीरामचन्द्र तथा सीताजी मूर्तियां लाने को कहा। इन मूर्तियों की विशेषता यह थी कि इन मूर्तियों को श्रीरामचंद्र जी ने स्वयं अश्वमेध यज्ञ के लिए बनवाया था। ये आत्मा के आकार यानि अगुंष्ठ मात्र भारतीय शास्त्रीय प्रमाण की हैं। अयोध्या से मूर्तियों को लाने का काम वैष्णव संत के शिष्य पण्डित दामोदर दास गोसांई को दिया गया। दामोदर दास के बारे में बताया जाता है कि उसके पास एक विशेष सिद्धि थी जिसके द्वारा वह मुंह में कुछ पदार्थ रखकर अदृश्य हो गया और अयोध्या में प्रकट हो गया। वहां वह त्रेतानाथ मंदिर के एक पुजारी का शिष्य बन गया। दामोदर दास ने वहां से मूर्तियों को उठाया और हरिद्वार तक पहुंचा दिया। वहां के पुजारी जोधावर को गुजारे की रकम भिजवाने के बाद दामोदर दास मूर्तियां लेकर कुल्लु की ओर चल पड़ा। इसके बाद राजा ने दामोदर दास का खूब स्वागत किया और अपने सिंहासन पर स्थित नृसिंह भगवान के साथ ही मूर्तियों को स्थापित कर दिया। इस अवसर पर राजा ने बड़े उत्सव का आयोजन किया। राजा को कुष्ठ की बीमारी थी लेकिन प्रतिदिन की पूजा को देखने और चरणामृत के सेवन से राजा रोगमुक्त हो गया। राजा ने अपनी सारी जागीर रघुनाथ जी को अर्पण कर दी और स्वयं सेवक बन गया। मूर्तियां लाने वाले पण्डित दामोदार दास को राजा ने भूईंण यानि भून्तर में मंदिर बनवा दिया तथा चैरासी खार अनाज की पैदावार वाली जमीन मुआफी के रूप में प्रदान कर दी। आज भी इस वंश के पण्डित सालीग्राम गोसांई के घर में यह प्राचीन मंदिर मौजूद है। राजा रघुनाथ के लिए एक टका और एक रूपया प्रतिदिन भेंट करता था। राजा की ओर से 500 की राशि प्रतिवर्ष अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर में पहुंचा दी जाती थी। राजा ने त्रेतानाथ के पुजारी और उसके परिवार को बुलाकर कुल्लु बुलाया और जमीन की मुआफी का ताम्रपत्र प्रदान किया। वैष्णव धर्म के पोषक महात्मा कृष्णदास पयहारी सन्त ने राजा को अपना भक्त बना दिया। उस समय यहां नाथों का बहुत प्रभाव था। लेकिन महात्मा ने घाटी में वैष्णव धर्म का प्रचार किया। इसी समय से ही रघुनाथ जी कुल्लु के प्रधान देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। मूर्तियों के चमत्कार को देखकर कुल्लु के सभी 365 देवी-देवता श्री रघुनाथ जी के दर्शनों को आये। जो आजतक परम्परा का अटूट हिस्सा बना हुआ है।

कुल्लु का दशहरा मनाने की परम्परा है इन 6 स्थानों में

कुल्लु के दशहरे की इन 6 स्थानों में मनाने की परम्परा है 1 मकड़ाहर 2 हरिपुर 3 मणिकर्ण 4 ठाउआ 5 वशिष्ठ और 6 कुल्लू ढालपुर। इन मंदिरों में क?मकड़ाहर का मंदिर टूट गया है इसलिए यहां पर दशहरा बंद हो गया है। ठाउआ में एक दिन का दशहरा उत्सव रह गया है। यहां पर मुरलीधर का मंदिर स्थापित है आश्विन शुक्ल दशमी को सुबह शस्त्र और घोड़ पूजन होता है। इस दिन मंदिर में शालग्राम, हनुमान और गरूढ़ की मूर्तियों रथ की चैकियों में आरूढ़ कर रथ के मोटे-मोटे रस्सों को खींच कर मंदिर की ड्योढ़ी तक लाते हैं। मूर्तियों को रथ से उतार कर मंदिर में लाने के साथ ही दशहरे का समापन हो जाता है। मणिकर्ण में राम और सीताजी की प्रतिष्ठित मूर्तियां बनाकर श्रृंगार करके रथ पर आरूढ़ किया जाता है। जलूस के साथ पार्वती नदी के उंचे स्थान पर पहुंचकर नदी के बांयें किनारे पर छोटे घड़े को रखा जाता है। दूर रखे घड़े को पत्थर से तोड़ने की कोशिश की जाती है। जैसे ही घड़ा टूट जाता है लोग जयश्रीराम का नारा लगाकार हनुमान जी को सम्मानित करते हैं और यात्रा जहां से शुरू होती है वहीं आकर वापिस लौट आती है। हरिपुर में यह उत्सव विजय दशमी से सात दिन तक चलता है लेकिन अब यह केवल पांच दिन तक ही सीमित हो गया है। इसके पीछे कारण यह है कि लोग अंतिम दो दिनों में हरिपुर में सामान खरीदने और दशहरा देखने के लिए कुल्लु चले जाते हैं। मनाली से 3 किलोमीटर दूर वशिष्ठ गांव बसा है। मंदिर में श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की बड़ी मूर्तियां हैं। यहां भी कूल्लू की भांति दशहरा मनाया जाता है। कुछ वर्ष पहले तक यहां भी रथयात्रा होती थी लेकिन रथ टूटने के कारण दशहरा में अब रथयात्रा नहीं होती।

ढालपुर घाटी में रघुनाथजी के सम्मान में यज्ञ करने के लिए न्योता

कुल्लू के दशहरे में आश्विन महीने के पहले 15 दिनों में राजा सभी देवी-देवताओं को ढालपुर घाटी में रघुनाथजी के सम्मान में यज्ञ करने के लिए न्योता देते हैं। 100 से ज्यादा देवी-देवताओं को रंगबिरंगी सजी हुई पालकियों में बैठाया जाता है। इस उत्सव के पहले दिन दशहरे की देवी, मनाली की हिडिंबा कुल्लू आती हैं। राजघराने के सब सदस्य देवी का आशीर्वाद लेने आते हैं। यह उत्सव आज भी क्षेत्रवासियों के लिए अपने देवताओं से मिलने का अभिन्न अवसर है। आयोजन के दौरान देवनृत्य होता है तो श्रद्धालु भी रात-रात उनके इर्दर्गिद नाचते रहते हैं। दिन में देव, गूर के माध्यम से भविष्यवाणी करते हैं। भक्त मनौतियां करते हैं। यहां दैवीय शक्ति के अनुभव होते देखे जा सकते हैं। दशहरा के अंतिम दिन लंका दहन होता है। निश्चित समय पर रथ पर सवार रघुनाथजी, मैदान के निचले हिस्से में नदी के किनारे पर ग्रामीणों द्वारा लकड़ी एकत्र कर निर्मित की सांकेतिक लंका को जलाने जाते हैं। शाही परिवार की कुलदेवी होने के नाते देवी हिडिम्बा भी यहां विराजमान रहती हैं। परम्पराएं ऐसी हैं कि कई देवता व्यास नदी लांघे बिना इस देव समारोह का हिस्सा बनते हैं। एक देवी की माता गांव के साथ एक पेड़ के पास बैठकर दशहरा देखती हैं।

अयोध्या से लाई गयी मूर्तियां आज भी विराज रही सुल्तानपुर के रघुनाथ मंदिर में

अयोध्या से लाई मूर्तियों को पहले मकड़ाहर में राजगद्दी के साथ भगवान नृसिंह भगवान के साथ स्थापित किया गया। मकड़ाहर से इन मूर्तियों को तीर्थ-स्थल मणिकर्ण ले जाया गया। वहां पर स्थित श्रीराम मंदिर में उनको रखा गया। 1645-50 के लगभग सुल्तानपुर के राजा सुल्तानचंद और उसके भाई जोगचंद को मारकर उनके क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। सुल्तानपुर में महल बनवाये गये इसके साथ ही श्रीरघुनाथ मंदिर का निर्माण भी करवाया गया। राजा ने 1660 ई. में अपनी राजधानी नगर से सुल्तानपुर में स्थानान्तरित की। 1660 ई. में ही अयोध्या से लाई हुई मूर्तियों को मणिकर्ण से सारू-मारू के रास्ते होते हुए सुल्तानपुर लाकर रघुनाथ मंदिर में स्थापित किया। श्री रघुनाथ मंदिर के निकट के बाजार का नाम बाद में रघुनाथपुर पड़ गया। यहां पर 46 के लगभग उत्सव मनाये जाते हैं। विजयदशमी की गणना उन उत्सवों में की जाती है। आज भी राजा जगतसिंह के वंशज एवं राज परिवार का बड़ा सुपुत्र श्री रघुनाथ जी का छड़ीवरदार कहलाता है और उसकी उपस्थिति हर उत्सव में अनिवार्य है।

पर्यटन की दृष्टि से कुल्लु दशहरे का महत्व

पर्यटक कुल्लू में सेब बागीचों, राक क्लाइंबिंग, रिवर राफ्टिंग, पर्वतारोहण, ट्रैकिंग, पैराग्लाइडिंग का स्वाद चख सकते हैं। धार्मिक श्रद्धालू कुल्लू नगर में भगवान राम रघुनाथ के मंदिर के इलावा, कुल्लू मनाली रोड पर वैष्णोदेवी का गुफामंदिर, भेखली में भुवनेश्वरी मंदिर जो पहाड़ी पेंटिंग्स व पत्थर मूर्ति शिल्प के लिए प्रसिद्ध है, दियार में भगवान विष्णु मंदिर, बजौरा में आठवीं शताब्दी निर्मित पत्थर पर कार्विंग के लिए प्रसिद्ध शिव के विश्वेश्वर मंदिर का रूख कर सकते हैं। कुल्लू का रूपी महल मिनिएचर पेंटिंग्स का दिलकश नमूना है।

रघुनाथ जी, सीता और हिडिम्बा जी की रथयात्रा और जुलूस

दशहरे में जब देवी हिडिम्बा रघुनाथ रघुनाथ मन्दिर से राजमहल को आती है, उस समय राजपरिवार का कोई सदस्य देवी से नहीं मिलता। दशहरा उत्सव में रघुनाथजी, सीता और हिडिम्बा जी की रथयात्रा और जुलूस निकलता है। रथ में रघुनाथजी तथा सीता व हिडिंबाजी की प्रतिमाओं को रखा जाता है। रथ को एक से दूसरी जगह ले जाया जाता है, जहां यह रथ 6 दिन तक ठहरता है। इस दौरान छोटे-छोटे जुलूसों का सौंदर्य देखते ही बनता है। राजपरिवार हिडिम्बा देवी को अपने परिवार का मुख्य मानते हैं। यदि आप विजयदशमी की सारी क्रियाऐं देखते हैं तो लगता है कि उसके बिना कोई कारवाही नहीं होती। जब देवी का मन्दिर बनता है तब भी राजा का विशेष अधिकार रहता है। तभी देवी हिडिम्बा को राजदादी कहते हैं।

मोहल्ला या देवदरबार उत्सव का आयोजन

विजयदशमी उत्सव के 6ठें दिन दोपहर बाद मुहल्ला या देवदरबार होता है। सभी देवी-देवता इकट्ठे आकर मिलते हैं जिसे ‘मोहल्ला‘ कहते हैं। मन्दिर में देवी हिडिम्बा देवी के आने से मुुहल्ला उत्सव शुरू होता है। रघुनाथजी के इस पड़ाव पर सारी रात लोगों का नाच-गाना चलता है।

लंका दहन

लंकादहन वाले दिन सुबह कन्यापूजन होता है, तत्पश्चात पांच बलियों की राजा के परिसर में पूजा होती है। वह स्थान निश्चित है तथा आज भी ढालपुर मैदान में राजा की चानणी के अन्दर है। सांयकाल जब रघुनाथ जी अपने मन्दिर में पहुंचते हैं तब वहां रामरास होती है। रघुनाथ जी जब रथ से उतर कर पालकी में सवार होते हैं तब श्रृंगा ऋषि का रथ भगवान जी पालकी के दाहिनी ओर चलता है और पालकी लोअर ढालपुर की ओर जाती है। 7वें दिन रथ को ब्यास नदी के किनारे ले जाया जाता है, जहां लंकादहन का आयोजन होता है।

विश्वविख्यात कुल्लू दशहरा में होता है अपार उत्साह

इसके पश्चात रथ को पुनः उसके स्थान पर लाया जाता है और रघुनाथजी को रघुनाथपुर के मंदिर में पुनःस्थापित किया जाता है। इस तरह विश्वविख्यात कुल्लू का दशहरा हर्षोल्लास के साथ संपूर्ण होता है। कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ करते हैं। दशमी पर उत्सव की शोभा निराली होती है। दशहरा पर्व भारत में ही नहीं, बल्कि भारत के बाहर विश्व के अनेक देशों में उल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। भारत में विजयादशमी का पर्व देश के कोने-कोने में मनाया जाता है। भारत के ऐसे अनेक स्थान हैं, जहां दशहरे की धूम देखते ही बनती है। कुल्लू के साथ-साथ मैसूर का दशहरा काफी प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत तथा इसके अतिरिक्त उत्तर भारत, बंगाल इत्यादि में भी यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है।

कुल्लु दशहरे से पारम्परिक वस्तुओं के विक्रय से हो रहा आर्थिक गतिविधियों का विस्तार

कुल्लु का दशहरा अंतराष्ट्रीय पटल पर अपनी विशेष छाप छोड़ चुका है। वर्तमान के दशहरा उत्सव में व्यापारिक गतिविधियों का निरन्तर विस्तार हो रहा है। ऐसे में कुल्लु की जो खास शान रही है उन सभी उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पहचान मिलना स्वाभाविक ही है। कुल्लु की बनी हिमाचल शाॅल और टोपी विश्व प्रसिद्ध हो चुकी है। कुल्लु और किन्नौरी शाॅल को भारत को भारत सरकार ने हथकरघा के अंतर्गत आरक्षित किया है। इन दोनों उत्पादों का पेटेंट करवाया गया है। राज्य हथकरघा एवं हस्तशिल्प निगम के माध्यम से नौ जिलों लगभग 450 हथकरघा एवं हस्तशिल्प निगम के माध्यम से बुनकरों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। राज्य मंे 12 विक्रय केंद्रों और एक विक्रय केंद्र दिल्ली के माध्यम से हथकरघा उत्पादों की बिक्री को सुनिश्चित की जा रही है। इन सभी गतिविधियों को कुल्लु दशहरा विशेष रूप से सशक्त करता है। कुल्लु दशहरे में हथकरघा से बनी वस्तुएं प्रदर्शित होती है। जिसको देश और विदेश के लोग देखते हैं और उत्पाद की विश्वस्तरीय मांग के लिए आधार तैयार होता है। दशहरा उत्सव में हर साल गर्म कपड़ों का खूब व्यापार होता है। यहां पर पंजाब, हरियाणा और उतरप्रदेश तक के कई व्यापारी यहां पर पहुंचते हैं। दशहरा उत्सव में अस्थाई हजारों की संख्या में आये व्यापारी करोड़ों का व्यापार करते हैं। कुल्लु जिले में सेब व फलदार फसलें अच्छी होने से किसानों और बागवानों को खूब लाभ होता है। कुल्लु का दशहरा यहां के लोगों को बड़ा बाजार उपलब्ध करवाता है।

इस बार स्थगित रहेंगी व्यापारिक गतिविधियां

कुल्लू दशहरा में कोरोना महामारी के कारण इस बार आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होंगी। इस बार व्यापारिक गतिविधियांे पर रोक रहेगी जिस कारण दशहरा उत्सव से किसी भी प्रकार की आमदनी नहीं हो पायेगी। इससे दशहरा में स्थानीय स्तर और बाहर से यहां अपनी आर्थिक गतिविधियों का संचालन करने वाले व्यापारियों पर विराम रहेगा। गौरतलब है कि कुल्लू दशहरे में प्रतिवर्ष करोड़ों रूपयों का कारोबार होता रहा है जिससे यहां स्थानीय स्तर पर भी कई प्रकार के रोजगार के अवसर प्राप्त होते रहे हैं।

अंतराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे में संक्षिप्त रूप से होगा प्राचीन परम्पराओं का पालन

कोरोना के चलते अंतराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में इस बार संक्षिप्त रूप से ही मनाया जायेगा। वहां के कारदारों ने भी सरकार और प्रशासन से कोरोना काल में कुल्लु दशहरा के लिए दिशा-निर्देश मांगे थे। पहली बार हजारों की जगह मात्र में 200 लोग ही भगवान रघुनाथ के रथ को खींचेंगे। कुल्लू की सैंज घाटी के लक्ष्मीनारायण भगवान के बिना दशहरा उत्सव अधूरा माना जाता है। इस बार बंजार व सैंज घाटी से मात्र भगवान लक्ष्मीनारायण का ही एक देवरथ दशहरे में उपस्थित होगा। इससे पहले भगवानर लक्ष्मीनारायण 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय हुए भी उपस्थित रहे थे। इसके बाद 1972 में जलेब विवाद के समय भी इनका देवरथ दशहरे में मौजूद रहा। इस उत्सव में इस बार 200 लोग ही भगवान रघुनाथ का रथ खींचेंगे। इस बार देव परम्पराओं के निर्वहन के लिए 6 से 7 के करीब देवी-देवताओं के रथ भाग लंेगे। हजारों की संख्या में लोगों के आने की आशंका को देखते हुए इस बार देवी-देवताओं और प्रशासन की ओर से किसी प्रकार का निमन्त्रण नहीं दिया गया है। कुल्लु की दशहरा समिति इस बार अधिक भीड़ एकत्र करने के मूड में नहीं है। श्रीरघुनाथ जी यात्रा में रथ खींचने वाले सभी श्रद्धालुओं को अपना कोविड टेस्ट करवाना होगा। इन लोगों को पहचानपत्र भी मुहैया करवाये जायेंगे। इस बार रथयात्रा में सामाजिक दूरी का पूरा ख्याल रखा जायेगा। इसके लिए रथ मैदान को संवारने का काम शुरू किया गया है। भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने कहा कि दशहरा में भगवान रघुनाथ की रथयात्रा होगी और इसको लेकर तैयारियां की जा रही हैं। कोरोना के कारण रथयात्रा में सभी जरूरी चीजों का ध्यान सबको रखना है। इस बार दशहरा उत्सव में देवी-देवताओं को नजराना देने की व्यवस्था भी नहीं हो पायेगी।

कुल्लु दशहरे का होगा लाईव प्रसारण

इस बार अंतराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव की सभी परम्पराओं का लाईव प्रसारण किया जायेगा। ताकि लोग इस उत्सव में ऐसा महसूस न करे कि कोरोना के कारण वे महत्वपूर्ण परम्पराओं के दर्शन से वंचित हो गये हैं। स्थानीय स्तर पर दशहरा उत्सव से जुड़ी परम्परायें लोगों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। ऐसे में लोगों का एक उत्साह पर्व के प्रति बना रहता है। प्रशासन ने भी लोगों की भावनाओं का आदर करते हुए और कोरोना के खतरे को देखते हुए दशहरे की परम्पराओं के सूक्ष्म निर्वहन का लाइव प्रसारण करने का विचार किया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

ऐतिहासिक रथ यात्रा के साथ सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे का सादगीपूर्ण आगाज

Mon Oct 26 , 2020
एप्पल न्यूज़, कुल्लू  अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सात दिवसीय कुल्लू दशहरा का आज कोविड-19 के संकट के बीच देवरथ यात्रा से सादगीपूर्ण आगाज हुआ। शिक्षा व कला, भाषा एवं संस्कृति मंत्री गोविंद सिह ठाकुर ने श्री रघुनाथ जी सहित सभी देवी-देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त किया। श्री रघुनाथ जी की रथयात्रा में […]

Breaking News