एप्पल न्यूज़, शिमला
हिमाचल हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव से पहले सरकार को बड़ा झटका दिया है। महिला मंडल उमरी समेत कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि पंचायतों के गठन, पुनर्गठन और सीमांकन (डिलिमिटेशन) की प्रक्रिया कानून के अनुसार ही होनी चाहिए और नियमों का सख्ती से पालन अनिवार्य है।
कोर्ट ने साफ कहा कि यदि डिलिमिटेशन तय प्रक्रिया के तहत नहीं किया गया है, तो उसे अवैध माना जाएगा और चुनाव में उसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
इस फैसले के बाद 13 फरवरी 2026 के बाद बनाई गई नई पंचायतों पर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि कई मामलों में नियमों का पूरा पालन नहीं किया गया।
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की बैंच ने यह भी स्पष्ट किया कि पंचायतों से जुड़ी पूरी प्रक्रिया दो चरणों में होती है, पहले सरकार पंचायतों का गठन या पुनर्गठन करती है और उसके बाद संबंधित उपायुक्त (डीसी) क्षेत्रों का सीमांकन करता है।

इस दौरान नोटिस जारी करना, आपत्तियां लेना और उन पर निर्णय देना जरूरी है। इन नियमों की अनदेखी होने पर पूरी प्रक्रिया अमान्य मानी जाएगी।
साथ ही, जहां सभी नियमों का ठीक से पालन किया गया है, वही पंचायतें और उनका सीमांकन मान्य होगा और उन्हीं के आधार पर चुनाव कराए जा सकेंगे।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह 7 अप्रैल 2026 तक आरक्षण रोस्टर जारी करे और तय समय सीमा के भीतर पूरी चुनाव प्रक्रिया पूरी करे।
राज्य सरकार ने 13 फरवरी के बाद लगभग 196 नई पंचायतें बनाई है जिसमें हाई कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव लटक सकते हैं।
कोर्ट ने कहा है कि मौजूदा हालात की जल्दबाजी और खास परिस्थितियों को देखते हुए अभी सिर्फ जरूरी मुद्दों पर ही फैसला दिया है।
ग्राम पंचायतों के गठन, विभाजन, पुनर्गठन और सीमांकन की वैधता से जुड़े बाकी मुद्दों पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
इन सभी मामलों को आगे के लिए खुला रखा गया है, ताकि इन्हें बाद में अलग से उचित प्रक्रिया के तहत तय किया जा सके।
अगर याचिकाकर्ता चाहें, तो वे उचित समय के भीतर नई याचिका दायर कर इन मुद्दों पर फिर से सुनवाई करवा सकते हैं।





