अस्पतालों में कहाँ कंफ्यूजन होता है?
ईलाज करते कराते कहाँ एक दूसरे को दोष देना शुरू कर देते हैं?
कहाँ चिकित्सकों और पैरा मेडिकल स्टाफ को गलत समझ चीखना चिल्लाना शुरू हो जाते हैं लोग?
कहाँ बात का बतंगड़ बन जाता है?
कहाँ एक चिकित्सक/ पैरा मेडिकल स्टाफ को कोई भगवान का दर्जा देकर दुआएँ देते हैं और किन परिस्थितियों में उसी चिकित्सक या पैरा मेडिकल कर्मचारियों को उसी दौरान कुछ लोग गालियां निकाल कर बुरा भला कह बद् दुआ देकर उसका और उस संस्थान का जीना हराम कर रहे होते हैं …
……
सबका अपना-अपना अलग अनुभव, अपना आचरण, अपना अलग मरीज़, अलग वेदनायें ,अलग परिस्थितियां अलग व्यवहार अलग हालात ,अलग कार्यशैली,अपना अलग कार्यस्थल अलग सुविधाएं और कार्यस्थल का वातावरण और सभी की अलग ही अपने कार्य के प्रति मानसिकता होती है –
मरीज़ों के साथ आने वाले अविभावक भी अपनी इसी तरह की अलग अलग सेवा भावना से अस्पतालों में आते हैं ..कोई इतने सेवक होते हैं कि अपने मरीज के साथ-साथ दूसरे जरूरतमंद मरीजों की भी चुपचाप अत्यधिक सेवा करते हैं, उनकी कई तरह से ख़ामोशी से दवा, खून, पैसे से भी मदद भी करते हैं …सहायता का हाथ बढ़ा एक बहुत ही सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाते हैं …
अपना मरीज़ भी खुश, दूसरे भी उनसे प्रसन्न रहते हैं… वे सभी काम करने वाले चिकित्सकों और कर्मचारियों की भी मदद करते हैं और उन्हें अच्छा काम करने के लिये शाबाशी भी देते हैं … कुल मिलाकर सब प्रसन्न होते हैं और सारा वातावरण ख़ुशनुमा रखते हैं –
पर कुछ मरीज़ों के अविभावक न अपने मरीज़ों की मदद करते हैं न ही किसी दूसरे की … उन्हें हर बंदे से हर बात से शिकायत होती है …सभी को अपना नौकर सोचते हैं और सभी पर चिल्लाते हैं… अहंकार से भरे होते हैं …
अपने मरीज की चिंता करने के बजाय उन्हें सबको “सेट” करने की चिंता होती है …
कहाँ मर गये सब?
दूसरे मरीज़ देख रहे हैं .. ..
ये साला तब से फोन पर बिजी है ..
तुम्हें पता है मैं कौन हूँ
कल तुम एक नहीं मिलोगे यहाँ,
तुम्हें पता नहीं मैं किस हद तक जा सकता हूँ?
इतने टेस्ट लिख दिये…
ये सैंपल अब मैं लेकर जाऊँगा?
MRI तक क्या TROLLEY मैं ले जाऊँगा?
इतनी दवाइयां लिख दी?
महंगे इन्जेक्शन लिखे, तुम कमिशन खाते हो …
मेरे मरीज को स्पेशल वार्ड दो …
मेरे लिये साफ़ BATH ROOM चाहिये!
साथ वाला मरीज उल्टियां मार रहा है, इसे यहाँ से शिफ्ट करो..
ये वाला मरीज खांसी कर रहा है, मुझे इन्फेक्शन हो जायेगा?
मेरे बैठने को कोई कुर्सी तक नहीं?
आपने 3 UNIT खून के लिख दिये मैं कहाँ से लाउंगा ????
आजकल एक नयी बीमारी चल पड़ी है, झगड़ने और वीडियो रिकॉर्ड करने की और इस से भी ज्यादा बीमारी है अपने मरीजों की सेवा करने के बजाए हो हल्ला करने की, हुड़दंग कर वीडियो लाइव करने की …..
पीछे एक लाइव वीडियो चर्चाओं में रहा …
अस्पताल में दर्द से कराहती माँ , अंतिम साँसे साँसे लेती एक माँ ..
जिंदगी और मौत की अंतिम जंग लड़ रही मां और पल पल इस जंग में हारती एक लाचार माँ …. इनका सुपुत्र हर घड़ी यह दर्द भरा दृश्य लाइव स्ट्रीम में दिखा रहा था …
बहुत विचित्र बात देखी …
मृत्यु शैय्या पर बैठी माँ और उसके पास चंद घड़ियां थीं ..परिवार जन सब साथ पर बेटा लाइव कर सब न सिर्फ दिखा रहा था बल्कि रो भी रहा था और सभी को भला बुरा कह भी रहा था …
इत्तेफाक से मैं सारा लाइव देख भी रहा था …
कह रहा था देखो मेरी माँ मर रही है …देखो मेरी माँ को हार्ट अटैक आया है …देखो मेरी माँ को ये मार देंगे …इस लाइव स्ट्रीम को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें …इस लाइव स्ट्रीम से ज्यादा से ज्यादा जुड़े …
देखो मेरी माँ मर जायेगी… मैं इन्हें नहीं छोड़ूंगा …. साथ में हर बंदे को अस्पताल को, सरकार को लगातार कोस रहा था ….
देखो … खाली सिलिंडर है … देखो
लाइव कर रहा हूं… मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा …
लाइव लगातार चलता है ..थोड़ी देर बाद माँ की मृत्यु हो जाती है ..
देखो मेरी माँ मर गयी …इन्होंने मार दी …
मेरी माँ को छोटा सा हार्ट अटैक था ..
इन्होंने ईलाज नहीं किया …
देखो मुझे TROLLEY नहीं दे रहे …
एक महिला कर्मचारी से लाइव ही उलझता भी दिखा …
लाइव चलता रहा …
माँ संसार से चली गयी … “लाइव”
क्या यह सब लाइव करना उचित था …
क्या सभी चिकित्सकों और कर्मचारियों को लाइव जलील करना उचित था?
क्या ऐसे माहौल पैदा कर और सभी का मनोबल गिराकर सारा माहौल खराब (Toxic Environment) कर अच्छे working atmosphere की उम्मीद की जा सकती है ?? …
दुनियां में सब कुछ दुबारा मिल जायेगा, लेकिन वो माँ दुबारा नहीं मिलेगी …
जो अंतिम पल अम्मा के साथ सिराहने बैठ कर गुजारे हाथ पकड़ कर गुजारे जा सकते थे वो अस्पताल के कोने-कोने में कैमरा लगातार लाइव कर, चीख चीख कर दौड़ दौड़ क़ीमती वक्त, बेशकीमती घड़ीयां जाया कर कौन सा अच्छा काम था ….
माता की अंतिम साँसों का लाइव प्रसारण करने के बजाय माँ की एक अंतिम घड़ी में नजरें मिलाकर उनकी कोई अनकही बात, उनके अंतिम शब्द, अंतिम आशीर्वाद शांत होकर लिया होता तो शायद बेहतर होता …..
यही मां की सच्ची सेवा होती, सही मायने में सच्ची श्रद्धांजली भी होती –
माँ का जाना सच में बहुत असहनीय और अत्यंत दुःखद घटना होती है मुझे भी व्यक्तिगत तौर पर सच में बहुत दुख हुआ पर इस घटना का इस तरह सीधा प्रसारण सही था ????
आप की इस बारे क्या राय है ???
अपना आपा खोकर क्या लाइव करना उचित था …

संपादकीय
साभार
डॉ रमेश चंद, पूर्व MS IGMC







