एप्पल न्यूज, शिमला
हिमाचल प्रदेश सरकार का हालिया निर्णय — “लोकतंत्र प्रहरी विधेयक” को निरस्त करना — केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक बहस को जन्म देता है।
यह फैसला उन तमाम लोगों से जुड़ा है जिन्होंने 1975-77 के आपातकाल के दौरान जेल में समय बिताया था और जिन्हें लोकतंत्र के “संरक्षक” के रूप में सम्मान राशि दी जा रही थी।
न्याय या राजनीति?
भाजपा सरकार ने वर्ष 2021 में यह योजना शुरू की थी। तर्क यह था कि जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा में अपनी स्वतंत्रता खोई, उन्हें राज्य द्वारा सम्मान मिलना चाहिए।
परंतु सुक्खू सरकार का कहना है कि यह लाभ “विचारधारा विशेष” से जुड़े राजनीतिक वर्ग को दिया जा रहा था, जबकि लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व पूरे समाज का होता है, किसी एक दल का नहीं। इस दृष्टि से सरकार ने इसे समानता के सिद्धांत के विपरीत माना और अधिनियम को निरस्त कर दिया।

यह तर्क कानूनी दृष्टि से भले तर्कसंगत लगे, पर भावनात्मक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह फैसला कई सवाल उठाता है। क्या लोकतंत्र की रक्षा में जेल जाने वालों को “राजनीतिक” कहकर अलग कर देना उचित है?
क्या यह इतिहास के उस अध्याय को मिटाने जैसा नहीं है जिसमें लोगों ने लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष किया?
राजभवन बनाम सरकार
इस विधेयक को लेकर राजभवन और राज्य सरकार के बीच जो मतभेद उभरे, वह राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बढ़ते वैचारिक तनाव का प्रतीक है।
राज्यपाल ने बार-बार सरकार से इस निरसन के कारण पूछे, जबकि सरकार अपने रुख पर अडिग रही। अंततः राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह अध्याय अब समाप्त हो गया है।
यह घटना इस बात का भी संकेत है कि राज्यों में संवैधानिक संस्थाओं के बीच संवाद की संस्कृति किस हद तक राजनीतिक खींचतान में उलझ चुकी है।
सम्मान का अर्थ
लोकतंत्र प्रहरी योजना का उद्देश्य उन लोगों को सम्मान देना था जिन्होंने एक कठिन दौर में संविधान और नागरिक अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
उस सम्मान राशि का आर्थिक महत्व भले ही सीमित रहा हो, किंतु उसका प्रतीकात्मक महत्व बड़ा था — वह लोकतंत्र के प्रति निष्ठा का प्रतीक थी।
अब उस प्रतीक को समाप्त कर देना यह संदेश देता है कि राजनीतिक दृष्टिकोण बदलते ही सम्मान की परिभाषा भी बदल सकती है।
कांग्रेस सरकार का यह निर्णय संवैधानिक समानता के दृष्टिकोण से उचित ठहराया जा सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक इतिहास के प्रति संवेदनशीलता के दृष्टिकोण से यह एक भावनात्मक चूक भी लगती है।
लोकतंत्र केवल नीतियों से नहीं, बल्कि स्मृतियों से भी जीवित रहता है। और जब कोई सरकार उन स्मृतियों को मिटाने का निर्णय लेती है, तो वह इतिहास को थोड़ा अधूरा कर देती है।
राजनीति बदल सकती है, पर लोकतंत्र के लिए लड़ी गई लड़ाइयों को इतिहास से मिटाना उचित नहीं। सम्मान राशि भले खत्म हो जाए, पर लोकतंत्र प्रहरियों के योगदान को विस्मृति में नहीं जाना चाहिए।
सुक्खू सरकार ने अप्रैल 2023 के बजट सत्र में नया विधेयक लाकर पूर्व विधेयक को निरसन कर दिया था।
आपातकाल के दौरान जेल गए हिमाचल प्रदेश के नेताओं को अब सम्मान राशि नहीं मिलेगी। राष्ट्रपति ने लोकतंत्र प्रहरी विधेयक के निरसन का प्रस्ताव मंजूर कर दिया है। शुक्रवार को विधि विभाग ने राजपत्र में इस बाबत अधिसूचना जारी की।
सुक्खू सरकार ने अप्रैल 2023 के बजट सत्र में नया विधेयक लाकर पूर्व विधेयक को निरसन कर दिया था। भाजपा सरकार ने साल 2021 में 12,000 और 20,000 रुपये मासिक सम्मान राशि देने का इस विधेयक के तहत प्रावधान किया था
मुख्यमंत्री शांता कुमार और पूर्व मंत्री पूर्व राधारमण शास्त्री, सुरेश भारद्वाज सहित 105 नेताओं को मासिक पेंशन मिलना शुरू भी हो गई थी।
लोकतंत्र प्रहरी विधेयक को लेकर राज्य सरकार और राजभवन के बीच कई बार टकराव की स्थिति भी बनी। राज्य सरकार के जवाब से राजभवन ने असंतुष्ट होकर विधेयक को कई बार राज्य सरकार को लौटाया।
राज्यपाल ने सरकार से इस निरसन (रिपीलिंग) विधेयक को पारित करने और इस प्रावधान को खत्म करने के कारण पूछे थे। सरकार ने विधानसभा में विधेयक के निरसन का प्रस्ताव रखते वक्त तर्क दिया था कि इसका लाभविचारधारा विशेष से जुड़े राजनीतिक लोगों को दिया जा रहा है।







