एप्पल न्यूज़, नई दिल्ली/शिमला
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव 31 मई से पहले हर हाल में कराने का स्पष्ट और सख्त निर्देश जारी किया है। अदालत ने कहा कि पुनर्सीमांकन, पुनर्गठन या आरक्षण रोस्टर जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं के चुनाव टालना उचित नहीं है।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए समय पर चुनाव अनिवार्य हैं और इसमें अनावश्यक देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
यह मामला तब सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा जब हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 30 अप्रैल से पहले पंचायत चुनाव कराने और 28 फरवरी तक आरक्षण रोस्टर जारी करने के निर्देश दिए थे।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सरकार का कहना था कि प्रदेश में कई पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन (डिलिमिटेशन) का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है।
साथ ही आरक्षण रोस्टर तय करने और प्रशासनिक तैयारियों के लिए अधिक समय की आवश्यकता है। सरकार ने अक्टूबर तक का समय मांगा था।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि पंचायतें संविधान के तहत स्थापित स्थानीय स्वशासी संस्थाएं हैं और इनके चुनाव समय पर होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना का हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि पुनर्सीमांकन और आरक्षण रोस्टर जैसी प्रक्रियाएं चुनाव टालने का आधार नहीं बन सकतीं। हालांकि कोर्ट ने समय-सीमा में आंशिक संशोधन करते हुए राज्य सरकार को 31 मार्च तक पुनर्गठन, परिसीमन और आरक्षण रोस्टर की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
इसके बाद 31 मई से पहले हर हाल में चुनाव संपन्न कराने को कहा गया है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और चुनाव समय पर नहीं कराए जाते, तो इससे जमीनी स्तर पर प्रशासनिक और विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
लोकतांत्रिक ढांचे की निरंतरता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधि समय पर चुने जाएं। कोर्ट ने संबंधित विभागों और राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए।
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करने की बात कही है। सरकार के अनुसार, पंचायती राज विभाग, ग्रामीण विकास विभाग और राज्य निर्वाचन आयोग को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जा रहे हैं ताकि निर्धारित समय-सीमा के भीतर सभी प्रक्रियाएं पूरी की जा सकें। अधिकारियों का कहना है कि आरक्षण रोस्टर को अंतिम रूप देने, मतदाता सूची अद्यतन करने और अन्य प्रशासनिक तैयारियों को प्राथमिकता दी जाएगी।
इस फैसले के बाद प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है। पंचायत चुनाव ग्रामीण राजनीति की धुरी माने जाते हैं और इनके माध्यम से विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित होती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल हिमाचल प्रदेश बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक संदेश है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव निर्धारित समय के भीतर कराना सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
अब सबकी निगाहें राज्य निर्वाचन आयोग की ओर हैं, जो जल्द ही चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर सकता है।







