पुलिस- परोपकारी, बेचारी या फिर अत्याचारी -‘एक दृष्टिकोण’

एप्पल न्यूज़, ब्यूरो

पुलिस को देखकर जनमानस के मानस पटल पर आमतौर पर कोई अच्छा संदेश नहीं जाता। लोग पुलिस को बुराई का पर्याय समझते रहे है। पुलिस की छोटी सी कमी का ढिंढोरा तो पीट दिया जाता है मगर अच्छाई का कभी भी गुणगान नहीं होता। पुलिस के हर कार्य को संदेह की दृष्टि से ही देखा जाता रहा है। ऐसा इसलिए भी होता रहा है, क्योंकि जनता ने पुलिस के कार्य को कभी भी नजदीकी से नहीं देखा। इन्हीं दूरियों के कारण पुलिस व जनता के आपसी सम्बन्ध मैत्री पूर्ण व सौहार्द पूर्ण नहीं हो सके।


वास्तव में पुलिस को विभिन्न परिस्थितयों में काम करना पड़ता है। संभवतः उसे परोपकारी, बेचारी व अत्याचारी की संज्ञा दी जा सकती है। पुलिस को एक ऐसी दोधारी नंगी तलवार पर चलना पडता है जो दोनों तरफ से काटती है। किसी अपराधी के साथ सख्ती न की जाये तो नपुंसक कह दिया जाता है और यदि उसके साथ सख्ती वाला व्यवहार किया जाये तो पुलिस को कलंकी माना जाता है । पुलिस को तो प्रतिदिन कुरुक्षेत्र की लडाई लडनी पडती है

समाज में युद्भ के हर दिन का आकलन बहुत बारीकी से किया जाता है। आज कोरोना की जंग में सभी लोग पुलिस को अपना मसीहा मान रहे हैं। पुलिसवालों के ऊपर पुष्प वर्षा की जा रही है। हर नागरिक अपनी सहानुभूति प्रकट करता नजर आ रहा है। ऐसा हो भी क्यों न…! आज हम सभी जब अपने-अपने घरों में महफूज हैं तो पुलिस वाले सडकों, चौराहों, गली-कूचों में दिन रात पहरेदारी करते नजर आ रहे हैं। लोगों का अपने परिजनों के साथ सम्बन्ध भी तब तक ही है जब तक वे सकुशल हैं। कोरोना के खूनी पंजों से काल ग्रस्त हुए लोगों का दाह संस्कार भी पुलिस को ही करवाना पडता है। अब तो लोग पुलिस वालों को अपने घर के सदस्यों से भी अधिक मान-सम्मान देते नजर आ रहे है।
पंजाब के पटियाला में हुई एक घटना में पुलिस सहायक सब- इन्स्पेक्टर हरजीत सिंह को अपनी ड्यूटी को बखूबी निभाते हुए अपना हाथ कटवाना पडा। आज सारा पंजाब इस यौद्भा को सैल्यूट कर रहा है और उसके शीघ्र सकुशल होने की कामना भी कर रहा हैं। कोरोना की इस जंग में इस पुलिस अधिकारी ने पंजाब की गुरुओं की धरती पर गुरु तेग बहादुर जैसे योद्धाओं जिन्होंने अपने देश की खातिर अपना शीश कटवाया, गुरु गोविन्द साहिब जिन्होंने अपने वतन की खातिर चारों पुत्रों की आहुति दी, उसी धरती पर आज हरजीत सिंह ने अपनी वीरता का प्रमाण देकर पूरे पुलिस विभाग का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है। इस वीर सिपाही ने अपना हाथ कट जाने के उपरांत भी अपने साथियों को उस पर हमला करने वाले अपराधियों को पकडने के लिए ललकारा तथा पूरे जोश और जुनून के साथ अपनी डयूटी को अमलीजामा पहनाया। पंजाब में आज कल हर पुलिसवाला सब-इंसपेक्टर हरजीत सिंह की नाम पट्टिका लगा कर घूम रहा है। हरजीत तो उस चंदन के पेड की तरह बन गया है जिसने पूरे जंगल को अपनी खुुुशबू से महका दिया है।

ऐसे अन्य और भी बहुत से उदाहरण हैं जिनमें पुलिस जवानों ने हम सबकी सुरक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है। वर्ष 2008 में मुंबई में आतंकवादी हमला हुआ तो हेमंत करकरे व तुक्का राम आंवले जैसे अधिकारियों ने हमलावर आतंकवादियों का डटकर मुकाबला करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। जनता आज ऐसे सभी पुलिस वीरों को नमन करते देखी जा सकती हैं। मगर कभी कभी पुलिस की लाचारी व बेबसी का प्रयोजन भी देखने को मिलता है जिससे लोगो को पुलिस की कार्यकुलता पर संदेह होना स्वभाविक हो जाता है।

हाल ही में महराष्ट्र के पालघर जिले में एक ऐसी दर्दनाक व शर्मनाक घटना हुई, जिसमें हिंसक लोगों ने दो संतों व उनके चालक की पत्थरों व डंडों से निर्मम हत्या कर दी। पुलिस जवानों के सामने ही नहीं बल्कि इन जवानों ने उन संतों को मरने के लिए भीड के हवाले कर दिया।

इसी तरह वर्ष 2019 में पुलवामां की आतंकवादी घटना में सी0आर0पी0एफ0 के 40 जवानों की हत्या कर दी गई थी। इसमें उसी क्षेत्र के देवेन्द्र सिंह डीएसपी की संलिप्तता भी पाई गयी। ऐसे उदाहरणों ने पूरे पुलिस विभाग को दागदार कर दिया है। पुलिस की ऐसी कसाईगिरी व उदण्डता की और भी कई घटनाएं हैं जो निश्चित तौर पर विभाग पर ग्रहण लगाती हैं। ऐसे कर्मचारी निश्चित तौर पर एक ऐसी सडी मछली का काम करते हैं लेकिनजो पूरे तालाब को गंदा कर देती हैं, जिसका पानी लाख दवाईयां डालने से भी शुद्ध नहीं हो पाता।
पुलिस नेतृत्व की लाचारी भी कभी कभी पुलिस जवानों की कर्तव्य निष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लगा देती है। हाल ही में नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ दिल्ली के शाहीनबाग में हुए दंगो में पुलिसवालों पर हर दिन पत्थर फैंके गए। कहीं जवानों की वर्दीयां फाड दी गई और कुछ जवानों को अपनी जान भी गवांनी पडी। आखिर क्या कारण था कि दंगाईयों से सख्ती से नहीं निपटा गया। पुलिस की कार्यप्रणाली क्यों दागदार होती रही। उत्तर स्पट है कि कहीं न कहीं पुलिस नेतृत्व में कमी रही, जिसके परिणाम स्वरूप पुलिस की छवि मटमैली हुई।

इसी तरह ऐसी भी घटनाएं हैं जब जवानों को उचित उपकरण नहीं मिले या फिर घटिया किस्म के मिलते रहे है। 26-11-2008 की मुम्बई घटना में जंबाज वरिष्ठ पुलिस अधिकारी करकरे ने, विभाग से मिली बुलेट प्रूफ वर्दी पहन रखी थी मगर इस वर्दी को भेदती दुश्मन की गोलियों ने उस वीर जवान की जान ले ली।
इसके अतिरिक्त भी अगर हम देखें तो पुलिस को आवश्यक साजो सामान जिनमें गाडिया व अन्वेण संबंधी उपकरण इत्यादि उपलब्ध नहीं हो पाते । ई7सके परिणामस्वरूप समाज में अपराध बढता चला जाता है और पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह खडे हो जाते हैं।

कोरोना की इस संकट की घडी में देखा गया है कि बहुत से पुलिसकर्मी इस वजह से भी संक्रमित हुए हैं क्योंकि उनके पास पीपीई किट( व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण नहीं थे)। यदि पुलिस का नेतृत्व एक गीदड जैसे अधिकारी के पास हो तो चाहे सभी जवान सिंह की तरह भी क्यों न हो वे अपनी गौरव गाथा का प्रमाण नहीं दे सकते। इसलिए यह आवश्यक है कि पुलिस का नेतृत्व एक योग्य, संयम वाले व कर्मठ अधिकारी के पास हो जो जवानों का अग्रणी बन कर उन्हें आगे ले जाये। राजनितिज्ञों के आगे नतमस्तक न हो कर एक सिंह की तरह नेतृत्व प्रदान करे।

पुलिस जवान बहुत ही तनावपूर्ण परिस्थितियों में काम करता है। हर तरफ से उस पर मानसिक दबाब रहता है। एक तरफ ट्रांसफर होने की लटकती तलवार जो कि राजनितीज्ञों के हाथ में होती है, दूसरी तरफ ऐसे अधिकारी जो कि उन्हें छोटी से छोटी बातों पर सजा तो देते रहते हैं, मगर उनको सही रास्ते पर चलने के लिए अपने ऊंचे नेतृत्व व व्यक्तिगत उदाहरण पर नहीं कर पाते।

इसके अतिरिक्त मिडिया/ प्रैस भी कभी कभी पुलिस को बंधक बना कर उनके साथ भद्दा मजाक करती रहती है। कुछ मीडिया वाले अपनी कलम की हेकडी से पुलिस की बखियां उधेड़ते रहते हैं। पुलिस का पाविक चेहरा दिखाने की दौड जैसी लगी होती है। दूसरा स्वच्छ रूप अंधेरे में ही रख लिया जाता है। सैनिकों की तरह पुलिस के जवान भी देश की आंतरिक व बाहरी सीमाओं में एक सफल व सृजन नायक बनकर देश व समाज के लिए बलिदान देते आ रहे हैं। मगर उन्हें आज तक शहीद की उपाधि से अलंकृत नहीं किया गया है।

“मैं एक सेवानिवृत पुलिस अधिकारी हूँ जिसने विभाग के हर पहलु को बहुत नजदीकी से देखा है। अपने सेवारत पुलिस कर्मीयों से कहना चाहूंगा कि वे कोरोना संकट की घडी में अपनी ड्यूटी को कर्तव्यनिष्ठा व सक्रियता से निभायें तथा जिम्मेदाराना मकसद लेकर अपनी वर्दी को दागदार होने से बचायें। पुलिसिंग के असल मकसद को समझें ताकि लोग ’खाकी कुत्ते मारो जूते’ की संज्ञा न देकर पुलिस वालो आगे बढो, हम तुम्हारे साथ है का गुणगान करें।”

पुलिस की स्थिति पर उर्दू के मशहूर शायर नक्श लायलपुरी की ये पंक्तियां खरी उतरती हैं…..


बडी आसान थी मंजिल हमारी।
मगर रहबर ने उलझाया बहुत है
।।

लेखक

राजेन्द्र मोहन शर्मा, IPS
डीआईजी ( रिटायर्ड )
हिमाचल प्रदेश पुलिस विभाग
सम्पर्क- 94180-24453

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