“हिंदी” मात्र एक भाषा नहीं, हिंदुस्तानियों की पहचान और शान है

राष्ट्रीय भाषा हिंदी का महत्व और हिंदी दिवस

एप्पल न्यूज़, ब्यूरो
“निज भाषा बोलहु लिखहु पढ़हु गनहु सब लोग।करहु सकल विषयन विषै निज भाषा उपजोग।।”                                        -श्रीधर पाठक
हिंदी मात्र एक भाषा की नहीं है यह हम हिंदुस्तानियों की एक पहचान और शान है। हिंदी हमारी देश की राष्ट्रीय भाषा भी है। हर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है आज हिंदी सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि बहुत सारे और देशों में भी बोली जाती है।भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लियाकि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी।  


अगर हम हिंदी भाषा की उत्पत्ति  के संबंध में  बात करें तो हिंदी की आदि जननी संस्कृत है।संस्कृत, पाली, प्राकृत भाषा से होती हुई अपभ्रंश तक पहुंचती है फिर अपभ्रंश, अवहट्ठ से गुजरती हुई प्राचीन हिंदी का रूप लेती है।सामान्यता हिंदी भाषा के इतिहास का आरंभ अपभ्रंश से माना जाता है।
अगर हम हिंदी शब्द की उत्पत्ति के बारे में बात करें तो हिंदू से ही हिंदी बना है हिंदू शब्द फारसी है जो संस्कृत शब्द सिंधु का फारसी रूपांतरण है। संस्कृत की सिंधु का इरानी में हिंदू हो गया जो सिंधु नदी के आसपास के प्रदेश के अर्थ में उपयुक्त हुआ और वहां के रहने वाले लोगों को हिंदू कहा गया। और वहां के लोगों की भाषा को हिंदी कहा गया।डाँ.भोलेनाथ तिवारी के अनुसार,
” हिंदू शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 7 वीं सदी के अंतिम चरण के ग्रंथ निशीथचूर्णि में प्रथम बार मिला है।”
 तैमूर लंग की पोती सरफुद्दीन यज्दी ने सन 1424 ई. में अपने ग्रंथ ‘जफरनामा” ने विदेशों में हिंदी भाषा के अर्थ में हिंदी शब्द का प्रयोग किया। डॉक्टर धीरेंद्र वर्मा द्वारा संपादित हिंदी साहित्य कोश (भाग-1) के अनुसार 13-14 वी शती में देसी भाषा को हिंदी या हिंदकी या हिंदूई नाम देने वाले हसन या अमीर खुसरो का नाम सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
अगर हम हिंदी के आधुनिक काल की बात करें तो भी हिंदी को 20वीं सदी तक संघर्ष करना पड़ा क्योंकि 19 सदी तक ब्रजभाषा काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित थी।भारतेंदुयुग में भारतेंदु जी ने गद्य में हिंदी का प्रयोग आरंभ कर दिया था मगर 1900 ईसवी के बाद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने जब सरस्वती पत्रिका का कार्य भार संभाला तो हिंदी गद्य के साथ-साथ पद्य में भी प्रतिष्ठित होने लग पड़ी।
भारत की स्वतंत्रता  के पहले  समाज सुधारक और धर्म सुधारक संस्थाओं का भी हिंदी को राष्ट्रीय भाषा  बनाने में  बेजोड़  सहयोग है। समाज सुधार की सभी संस्थाओं ने हिंदी भाषा को विशेष हिमायत भी और हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने पर जोर दिया ब्रह्म समाज के राजा राममोहन राय ने कहा कि,
” इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है।”
दूसरी तरफ आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने हिंदी के प्रयोग को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।वह कहते थे कि,
“मेरी आंखें उस दिन को देखना चाहती है जब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लग जाएं।”
भारत की स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में गौरवान्वित किया गया। और भारतीय संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक हिंदी भाषा के लिए प्रवाधान रखा गए। आज हिंदी हमारे देश की भाषा ही नहीं राष्ट्रीय भाषा के रूप में जाती है। भाषा की महत्व को बताती हुई गांधी जी बोलते हैं कि,
” मेरी मातृभाषा में कितनी खामियां क्यों ना हो मैं इसे इसी तरह चिपका रहूंगा जिस तरह एक बच्चा अपनी मां की छाती से जो जीवनदाई दूध दे सकती है अगर अंग्रेजी उस की जगह को हड़पना चाहती है जिसकी वह हकदार नहीं है तो मैं उसे सख्त नफरत करूंगा वह कुछ लोगों के सीखने की वस्तु हो सकती है लाखों करोड़ों कि नहीं।”
अंत में मैं अपनी कलम को विराम देते हुए यही कहूंगा हिंदी दिवस मात्र हिंदी का दिवस नहीं है हिंदी दिवस हमारी मातृभाषा का दिवस है जो लंबे समय से हमारा साथ निभा रही है भले ही बदलते समय के पारूप में इसमें बहुत बदलाव आए हैं मगर फिर भी यह एक मां की तरह हमारा हाथ थामे चलती रही है और आज भी क्या चल रही है। इसीलिए हमें भी एक अच्छे बच्चे की तरह अपनी मां का साथ निभाते रहना चाहिए ।।      “जय हिंद जय हिंदी”


लेखक

-राजीव डोगरा ‘विमल’ युवा कवि लेखक (भाषा अध्यापक)

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