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हाईकोर्ट में “डिप्टी चीफ व्हिप” पद पर जवाब तलब, “संवैधानिक वैधता” पर उठे सवाल, केवल सिंह पठानिया को “नोटिस” जारी

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एप्पल न्यूज, शिमला

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कांगड़ा जिले के शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक कुलदीप सिंह पठानिया की डिप्टी चीफ व्हिप (उपमुख्य सचेतक) के पद पर नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार समेत प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है।

कोर्ट ने तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने यह आदेश टेक चंद और तीन अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका पर दिया।

याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार द्वारा मुख्य सचेतक व उपमुख्य सचेतक की नियुक्तियों को असंवैधानिक बताते हुए इन्हें निरस्त करने की गुहार लगाई है।

याचिका में क्या कहा गया है?

  • याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(1A) के अनुसार किसी भी राज्य में मंत्रियों की संख्या विधानसभा सदस्यों की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।
  • बावजूद इसके, हिमाचल प्रदेश सरकार ने वर्ष 2018 में एक अधिनियम — The Salaries, Allowances and Other Benefits of Chief Whip and Deputy Chief Whip in Legislative Assembly of Himachal Pradesh Act, 2018 — पारित किया, जिसके तहत सचेतकों को कैबिनेट मंत्री के बराबर सुविधाएं देने का प्रावधान किया गया।
  • याचिका में दलील दी गई है कि यदि किसी व्यक्ति को मंत्री जैसे वेतन, भत्ते, वाहन, स्टाफ और अन्य सरकारी संसाधन दिए जाते हैं, तो वह मंत्री के बराबर ही माना जाएगा, भले ही उसका पदनाम कुछ और हो।
  • याचिकाकर्ताओं ने इस अधिनियम को संविधान विरोधी करार देते हुए इसे निरस्त करने तथा इन नियुक्तियों को शून्य घोषित करने की मांग की है।

क्या है डिप्टी चीफ व्हिप का पद?

डिप्टी चीफ व्हिप विधायी सदन में पार्टी के अनुशासन और कार्यसंविधान के पालन को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होता है।

यह पद हालांकि मंत्री नहीं होता, लेकिन राज्य सरकार ने इसे मंत्री के समकक्ष दर्जे और सुविधाएं प्रदान की हैं।

आगे क्या?

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार व अन्य प्रतिवादियों को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं।

कोर्ट का अगला रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या सरकार इस अधिनियम को संविधान के दायरे में ठहरा पाने में सफल होती है या नहीं।


यह मामला केवल एक नियुक्ति विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक व्याख्या और लोकतांत्रिक मर्यादा का भी गंभीर प्रश्न है।

यदि कोर्ट याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय देती है, तो न केवल डिप्टी चीफ व्हिप बल्कि ऐसे सभी समान पदों की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

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