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दुःखद- श्रीखंड यात्रा मार्ग में चंडीगढ़ के यात्री की मौत, 60 हज़ार दो वर्ना मरने दो, श्रद्धालु की मौत ने खोली प्रशासनिक व्यवस्था की पोल

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एप्पल न्यूज, श्रीखंड/निरमंड
श्रीखंड महादेव यात्रा के दौरान एक श्रद्धालु की मौत ने प्रशासन की तैयारियों और आपातकालीन सेवाओं की हकीकत को उजागर कर दिया है।

मृतक के परिजन ने न सिर्फ प्रशासन पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं, बल्कि यात्रा के दौरान खुलेआम हो रही जबरन उगाही और अमानवीय व्यवहार की कहानी भी सामने रखी है।

घटना का विवरण: बीमारी, देरी और लूट

मृतक श्रद्धालु चंडीगढ़ निवासी था, जो अपने भाई विशाल के साथ श्रीखंड यात्रा पर आया था। विशाल ने बताया कि 12 जुलाई को दर्शन के बाद लौटते समय पार्वती बाग में उसके भाई की तबीयत बिगड़ गई। वहां मौजूद मेडिकल स्टाफ ने तत्काल नीचे ले जाने की सलाह दी, लेकिन हालात और बिगड़ते गए।

जब वे लोग थाचडू पहुँचे, तब मरीज पूरी तरह असहाय हो चुका था। ऐसे में स्ट्रेचर पर लाने के लिए मौजूद नेपाली पोर्टरों ने ₹60,000 की मांग की। काफी मोलभाव के बाद यह राशि ₹40,000 तक लाई गई, लेकिन वह भी कैश में माँगी गई।

ऑनलाइन पेमेंट में देरी बनी मौत का कारण

विशाल ने बताया कि बार-बार विनती करने पर पोर्टरों ने ऑनलाइन भुगतान स्वीकार किया, लेकिन पेमेंट प्रोसेसिंग पूरी होने तक मरीज को उठाने से मना कर दिया। इस दौरान Singhgad से Jaon पहुँचने में उन्हें पाँच घंटे लग गए, जो सामान्यतः एक से डेढ़ घंटे में तय होता है।

आख़िरकार जब वे जाओं पहुँचे और मरीज को गाड़ी में लिटाया, तभी उसने अंतिम सांस ली।

प्रशासन की खुली नाकामी

यह यात्रा सरकार और प्रशासन की देखरेख में होती है। बाकायदा पेम्पलेट, पोस्टर और प्रचार के माध्यम से लोगों को आमंत्रित किया जाता है। लेकिन:

आपातकालीन व्यवस्था पूरी तरह फेल रही।

स्ट्रेचर जैसी बुनियादी सुविधा तक निर्धारित शुल्क या निगरानी में नहीं थी।

न कोई निगरानी अधिकारी समय पर पहुँचा, न चिकित्सा सहायता।

सवालों के घेरे में प्रशासन

  1. क्यों नहीं हैं निर्धारित दरें और निगरानी व्यवस्था?
  2. अमानवीयता की इस हद तक पहुँचने की ज़िम्मेदारी किसकी है?
  3. क्या श्रीखंड यात्रा केवल प्रचार का माध्यम बन कर रह गई है?

परिजनों की मांग और जनता में रोष

विशाल और उनके परिवार ने प्रशासन से न्याय की माँग की है और इस पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि अगर समय पर सुविधा मिलती, तो उनके भाई की जान बचाई जा सकती थी।

उधर स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं में भी भारी नाराज़गी देखी जा रही है।

जरूरत है ठोस कार्यवाही की, न कि बयानबाज़ी की

प्रशासन को इस मामले की गंभीरता को समझते हुए:

सभी सेवाओं के शुल्क तय कर सार्वजनिक करने चाहिए।

पोर्टरों और सेवाप्रदाताओं को पंजीकृत कर उनके ऊपर निगरानी रखनी चाहिए।

आपातकालीन सेवाओं के लिए त्वरित रेस्पॉन्स सिस्टम विकसित होना चाहिए।

यह कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन अगर अब भी इस पर संज्ञान नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में श्रीखंड जैसी कठिन यात्राएं श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था की बजाय जानलेवा अनुभव बनती रहेंगी।

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