IMG_20260124_200231
previous arrow
next arrow

RDG बंद होने से “वित्तीय आपातकाल” की दहलीज पर हिमाचल प्रदेश, “फ्रीबिज” हो सकती हैं बंद, संसाधन न जुटाए तो मुश्किल

IMG_20251207_105330
previous arrow
next arrow

एप्पल न्यूज़, शिमला
केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के लिए दिए जाने वाले राजस्व घाटा अनुदान (RDG) को समाप्त किए जाने के फैसले ने हिमाचल प्रदेश को गंभीर वित्तीय संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है।

हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि पहाड़ी राज्य हिमाचल वित्तीय आपातकाल जैसी स्थिति की दहलीज पर पहुंच सकता है।

राज्य सरकार का दावा है कि RDG बंद होने से न केवल विकास की रफ्तार थमेगी, बल्कि कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन, सब्सिडी और जनकल्याणकारी योजनाएं भी बुरी तरह प्रभावित होंगी।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में सचिवालय में हुई कैबिनेट बैठक के बाद वित्त विभाग द्वारा दी गई प्रस्तुति में इस संकट की भयावह तस्वीर सामने रखी गई।

वित्त विभाग के अनुसार हिमाचल प्रदेश को अपने सालाना खर्चों के लिए करीब 48 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होती है।

राज्य सरकार अपने संसाधनों से लगभग 42 हजार करोड़ रुपये जुटाने में सक्षम है, इसके बावजूद हर साल लगभग 6 हजार करोड़ रुपये का राजस्व घाटा बना रहता है। अब RDG बंद होने से यह घाटा और अधिक गहरा जाएगा।


राज्य सरकार का कहना है कि RDG की भरपाई नहीं होने की स्थिति में कर्मचारियों के वेतन और पेंशन भुगतान में दिक्कतें आ सकती हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल, बिजली और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं पर भी सीधा असर पड़ेगा।

कई विकास परियोजनाओं के ठप होने की आशंका जताई जा रही है, जिससे प्रदेश की आर्थिक गति और रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस स्थिति को संघीय ढांचे पर चोट बताते हुए स्पष्ट किया कि RDG बंद होना हिमाचल जैसे विशेष भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्यों के लिए अन्यायपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश के हितों से कोई समझौता नहीं करेगी और इस फैसले के खिलाफ राजनीतिक स्तर पर संघर्ष के साथ-साथ न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।


मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को भरोसा दिलाया कि सरकार विकास को पटरी से उतरने नहीं देगी, लेकिन इसके लिए सभी को एकजुट होकर केंद्र सरकार के समक्ष हिमाचल की मजबूती से पैरवी करनी होगी।

उन्होंने विपक्ष से भी अपील की कि वह राजनीति से ऊपर उठकर राज्यहित में सहयोग करे। हालांकि, वित्त विभाग की प्रस्तुति में विपक्षी विधायकों की गैरमौजूदगी को उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि RDG बहाल नहीं हुआ या कोई वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था नहीं की गई, तो हिमाचल प्रदेश को कड़े वित्तीय फैसले लेने पड़ सकते हैं।

ऐसे में खर्चों में कटौती, नई भर्तियों पर रोक और विकास योजनाओं के पुनर्मूल्यांकन जैसे कदम उठाने की नौबत आ सकती है।
कुल मिलाकर, RDG का बंद होना हिमाचल प्रदेश के लिए केवल आर्थिक नहीं, बल्कि विकास और सामाजिक संतुलन का भी बड़ा संकट बनकर उभरा है।

हिमाचल में गहराया आर्थिक संकट
कर्मचारियों को न डीए, न एरियर; सब्सिडी और विकास कार्यों पर भी संकट

हिमाचल प्रदेश सरकार अभूतपूर्व आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है। राज्य की वित्तीय स्थिति इस कदर डगमगा चुकी है कि सरकार ने कर्मचारियों की देनदारियों से लेकर जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों तक, लगभग हर मोर्चे पर हाथ खड़े कर दिए हैं।

वित्त विभाग द्वारा पेश ताजा आंकड़ों ने प्रदेश की कमजोर होती अर्थव्यवस्था की गंभीर तस्वीर सामने रख दी है।
कर्मचारियों और पेंशनरों को बड़ा झटका
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने साफ संकेत दे दिए हैं कि मौजूदा हालात में कर्मचारियों और पेंशनरों को न तो महंगाई भत्ता (डीए) दिया जा सकेगा और न ही लंबित एरियर।

वित्त विभाग की रिपोर्ट के अनुसार राज्य पर वेतन व पेंशन संशोधन का करीब 8,500 करोड़ रुपये और डीए/डीआर एरियर के लगभग 5,000 करोड़ रुपये बकाया हैं।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन देनदारियों को चुकाने की फिलहाल कोई वित्तीय क्षमता नहीं है। स्थिति इतनी गंभीर है कि नया वेतन आयोग लागू करना तो दूर, मौजूदा वेतन ढांचे को बनाए रखना भी चुनौती बन गया है।
हिमकेयर-सहारा समेत योजनाएं ठप होने की कगार पर
आर्थिक तंगी का सीधा असर आम जनता से जुड़ी योजनाओं पर भी पड़ रहा है। सरकार ने माना है कि वह हिमकेयर और सहारा जैसी अहम स्वास्थ्य योजनाओं की देनदारियां चुकाने में असमर्थ है।

इसके अलावा करीब 2,000 करोड़ रुपये के विकास कार्यों का भुगतान अगले वित्त वर्ष के लिए टाल दिया गया है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राज्यांश (मैचिंग ग्रांट) देने के लिए भी खजाने में पैसा नहीं बचा, जिससे नए विकास कार्य शुरू होना लगभग असंभव हो गया है।
सब्सिडी पर लटकी तलवार, यूपीएस पर पुनर्विचार
राज्य पर अदालतों के आदेशों के तहत लगभग 1,000 करोड़ रुपये के भुगतान का दबाव भी है, लेकिन खाली खजाने के चलते सरकार इसे देने की स्थिति में नहीं है।

हालात को देखते हुए सरकार को सभी प्रकार की सब्सिडी खत्म करने जैसे कड़े फैसलों पर विचार करना पड़ सकता है। साथ ही बढ़ते वित्तीय बोझ के कारण यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) पर भी पुनर्विचार की संभावना जताई जा रही है।
सब रोकने के बाद भी 6 हजार करोड़ का घाटा
वित्तीय विश्लेषण के मुताबिक यदि सरकार सभी पुरानी देनदारियां रोक दे, विकास परियोजनाएं बंद कर दे और सब्सिडी भी समाप्त कर दे, तब भी अगले वित्त वर्ष में लगभग 6,000 करोड़ रुपये के घाटे का अनुमान है।

यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि हिमाचल प्रदेश एक गहरे आर्थिक भंवर में फंस चुका है, जिससे उबरना मौजूदा सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

Share from A4appleNews:

Next Post

RDG थी अस्थायी व्यवस्था, "वित्तीय अनुशासन" से ही राज्यों की स्थिरता संभव, हिमाचल को पर्यटन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विशेष ब्याज-मुक्त सहायता- शेखावत

Sun Feb 8 , 2026
हिमाचल को पर्यटन, इंफ्रास्ट्रक्चर और आपदा राहत में केंद्र का निरंतर सहयोग; सेब व कृषि पर कांग्रेस भ्रम फैला रही एप्पल न्यूज़, शिमला केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने शिमला में आयोजित विस्तृत प्रेस वार्ता में बजट 2026, भारत की अर्थव्यवस्था, हालिया अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों और […]

You May Like

Breaking News