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कला और आस्था का द्योतक है केरल का थैय्यम नृत्यानुष्ठान

“गॉड्स ऑन कंट्री” ध्येय वाक्य से प्रसिद्ध केरल दक्षिणात्य  राज्यों में सांस्कृतिक विविधता एवं प्राकृतिक सुंदरता के मामले में अत्यधिक समृद्ध राज्य है। यहां के लोग विरासत में मिली परंपरागत  लोक तथा शास्त्रीय शैलियों को भविष्य के लिए संजोकर रखने में विश्वास रखते हैं। भौगोलिक आधार पर केरल एक छोटा सा प्रदेश है, फिर भी यहां सात शास्त्रीय तथा लगभग पचास से अधिक लोक नृत्यों का अभ्युदय हुआ है। यहां पर परिलक्षित शास्त्रीय एवं लोक नृत्य पूर्ण रूप से विकसित हैं और वहां के स्थानीय लोगों के स्वभाव को संगीत और वेशभूषा के साथ दिखाते हैं। इन नृत्यों को लोगों के जीवन जीने के हिसाब से और लोगों के नृत्य करने के अनुसार ढाला गया है। यहां पर प्रचलित नृत्य अत्यंत मनमोहक व प्राचीन हिंदू ग्रंथों के सिद्धांतों, तकनीकों एवं कला संबद्धता पर पूर्ण या आंशिक रूप से आधारित हैं। इससे यह बात प्रमाणित हो जाती है कि यहां के निवासी कितने कला प्रेमी व प्रायोगिक विचारधारा के हैं। यहां का प्राकृतिक व सांस्कृतिक सौंदर्य दर्शनीय है। केन्द्र सरकार की सेवा के दौरान मुझे लगभग एक वर्ष छह महीने केरल में रहने तथा वहां की संस्कृति को नजदीक से जानने का अवसर प्राप्त हुआ है। उसी दौरान कासरगोड जिला के नीलेश्वर नामक स्थान पर एक मंदिर में हो रहे धार्मिक समारोह थैय्यम को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। केरल के पारंपरिक घन वाद्य पंच (चेण्डी) तथा थायम्बका की गूंज से मंदिर का प्रांगण गूंज रहा था। प्रांगण के चारों तरफ श्रद्धालुओं तथा कला प्रेमियों की भीड़ खड़ी थी। अचानक विशेष प्रकार की कलात्मक पोशाक में सुसज्जित थैय्यम कलाकार मंदिर के चारों तरफ दौड़ लगाते हुए उपस्थित जनसमूह को आशीर्वाद देने लगा तथा दैवीय शैली में लोगों को चारों दिशाओं में जाकर प्रवचन देने लगा तथा वाद्यों की थाप पर मनमोहक भाव भंगिमाओं का प्रदर्शन करने लगा। इसी बीच वह वहां लाए गए मुर्गे को उठाता है और चाकू से उसकी गर्दन अलग कर देवी को रक्त चढ़ाता है। देखते ही देखते वहां का वातावरण गंभीर तथा दिव्यता में तब्दील हो गया। मैं यह सब देखकर काफी हैरान हुआ। हृदय में अचंभित करने वाले इस नृत्यानुष्ठान के बारे में और अधिक जानने की तीक्ष्ण इच्छा उत्पन्न हुई। तत्पश्चात जिज्ञासा वश मैं कन्नूर तथा कासरगोड जिलों के कई गांव में हुए थैय्यम कार्यक्रमों में देर रात तक रुका तथा इसके बारे में जानकारी एकत्रित करने की कोशिश की।

वास्तव में थैय्यम, तैय्यम या थियम केरल प्रदेश के उत्तर मालाबार क्षेत्र का एक  प्रमुख पूजा नृत्यानुष्ठान है। यह नृत्य अनुष्ठान मुख्य रूप से केरल के कासरगोड, कन्नूर, वायनाड, कोष़िक्कोड और कर्नाटक के सीमावर्ती इलाके कोडगु और तुलुनाडु में एक पंथ या समुदाय के द्वारा हजारों वर्ष पुरानी विधाओं और विधियों के माध्यम से निष्पादित किया जा रहा है। यहां के निवासी थैय्यम कलाकार को भगवान का प्रतिरूप मानते हैं तथा उनसे संम्पन्नता  तथा आरोग्यता का आशीर्वाद लेते हैं। थैय्यम कलाकारों तथा मलयालयी लेखक श्री भवानी चीरत, राजगोपालन तथा पेपिता सेठ द्वारा लिखित किताबों से प्राप्त जानकारी के अनुसार देवाट्टम (थैय्यम), पूरवेला, कलियाट्टम आदि शैलियों को उत्तरी मालाबार क्षेत्र में स्थापित तथा प्रचारित करने का श्रेय परशुराम को जाता है। उन्होंने ही इस प्रांत के आदिवासी समुदायों को थैय्यम के निष्पादन की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस अनुष्ठान में चढ़ावे के रूप में मांस तथा शराब आदि का प्रयोग किया जाता है इसके बावजूद भी इसे यहां के मंदिरों में अन्य सात्विक अनुष्ठानों की ही भांति बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।

एक अन्य दंतकथा के अनुसार थैय्यम के उद्भावक के रूप में मनक्काडन गुरुक्कल को माना जाता है। गुरुक्कल वन्नान जाति से संबंधित एक उच्च श्रेणी के कलाकार थे। चिरक्कल प्रदेश के राजा ने एक बार उन्हें उनकी दिव्य शक्तियों की परीक्षा लेने के लिए अपनी राज्यसभा में बुलवाया। राज्य सभा की तरफ यात्रा के दौरान राजा ने उनके लिए कई रुकावटें पैदा की लेकिन गुरुक्कल प्रत्येक रुकावट को दूर कर उनकी सभा में उपस्थित हो गए। उनकी दिव्य शक्तियों से प्रभावित होकर राजा ने उन्हें कुछ देवताओं के पोशाक बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी जिसका प्रयोग सुबह नृत्यानुष्ठान में किया जाना था। गुरुक्कल ने सूर्योदय से पहले ही 35 अलग अलग तरह की मनमोहक पोशाकें तैयार कर ली। उनसे प्रभावित होकर राजा ने उन्हें “मनक्काडन” की उपाधि से सम्मानित किया। वर्तमान में उनके द्वारा प्रचलित शैली से तैयार की गई पोशाकें ही थैय्यम कलाकारों द्वारा पहनी जाती हैं।

थैय्यम नृत्यानुष्ठान की प्रथम विधि को तोट्टम कहा जाता है। यह नृत्य साधारण सी पोशाक तथा अल्प श्रंगार के साथ मंदिर के गर्भगृह के सामने किया जाता है। इसमें कलाकार देवी या देवता के चमत्कारिक कार्यों का गान करते हुए थैय्यम के इतिहास पर आधारित जोशीला नृत्य करता है। यह गायन तथा नृत्य अत्याधिक ऊर्जावान तथा उत्साह से भरपूर होता है। तोट्टम प्रदर्शन के पश्चात थैय्यम के मुख्य प्रकार के प्रदर्शन के हेतु कलाकार विदाई ले कर चला जाता है तथा मुख्य क्रिया की तैयारी में जुट जाता है। इस  नृत्यानुष्ठान की तैयारी मुख के श्रृंगार से शुरू की जाती है। इस नृत्य के लिए मुख सज्जा करना अत्यंत कठिन कार्य होता है। पूरे चेहरे पर विभिन्न प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करते हुए वीर रस से प्रेरित आकृतियां बनाई जाती हैं। मुख की रंगाई करते समय विभिन्न रेखाएं खींची जाती हैं। इन सभी रेखाओं का अलग-अलग मतलब तथा महत्वता होती है। मुख अलंकार तथा पोशाक कलाकार द्वारा प्रस्तुत की जा रही कहानी एवं उसके इतिहास पर निर्भर करती है। पहनी गई पोशाक से यह मालूम हो जाता है कि थैय्यम की किस शैली तथा भावों का प्रदर्शन किया जा रहा है। वर्तमान में मुच्छिलोट भगवती,  विष्णुमूर्ति, गुलिकन, कण्डाकर्णन, मुत्तप्पन,  ती चामुंडी आदि प्रकार अति जनप्रिय है। टी चामुंडी नामक थैय्यम अत्यंत कठिन एवं जोखिम भरा माना जाता है। इस का प्रस्तुतिकरण करना प्रत्येक कलाकार के लिए अत्यधिक चुनौतीपूर्ण एवं साहसिक कार्य होता है। इस प्रदर्शन के दौरान कलाकार को जलते हुए अंगारों के बीच जाकर नंगे पांव नृत्य करना होता है। इसके दौरान उसकी पोशाक जिसे नारियल के पत्तों के पतले-पतले रेशे निकालकर बनाया जाता है। इश रेशों को कलाकार की कमर में चारों तरफ अत्यंत मनमोहक अंदाज में बांध दिया जाता है। दूर से देखने पर यह सूखी धान की तरह नजर आते हैं। इस नृत्यानुष्ठान के दौरान इस पोशाक को भी आग लगा दी जाती है। कलाकार इस नृत्य के दौरान अपने हाथों में भी दो जलती हुई मशालें  पकड़कर नृत्य करता है।

थैय्यम के प्रत्येक प्रकार में कलाकार स्वयं ही अपनी पोशाक तैयार करता है। पोशाक बनाने के लिए अक्सर नारियल के पत्तों के आवरण का प्रयोग किया जाता है। आवरण को लाल, काले तथा सफेद रंगों से रंगाई कर उस पर विभिन्न प्रकार के चित्र बनाए जाते हैं। इन चित्रों से आवरणऔर भी मनभावन तथा कलात्मक नज़र आते हैं। इसी प्रकार ताज़े तालपत्रों से आंचल, नारियल  के खोखले खोलो से स्तन तथा कमर पर एक लाल रंग का कपड़ा ओढ़ लिया जाता है। सिर की सज्जा के लिए एक कलात्मक ताज भी बनाया जाता है। इस शिरो भूषण का आकार तथा सज्जा भी थैय्यम की कथा पर निर्भर करता है। ताज या शिरोभूषण पोषक का सबसे पवित्र भाग माना जाता है। इसे देवता की मूर्ति के समक्ष ही पहना जाता है। इसे पहनते वक्त पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर वीर रस से प्रेरित धुनों के साथ कलाकार अपना प्रतिबिंब आईने में देखता है। इस दौरान कलाकार प्रतिबिंब में दैवीय शक्ति को भी महसूस करता है तथा अपने आप को उसके प्रतिरुप के रूप में प्रस्तुत करता है। तत्पश्चात कलाकार उस पोशाक में सुसज्जित होकर मंदिर के चारों तरफ दौड़ता हुआ जाता है। वह इस दौरान नृत्य की विभिन्न मुद्राओं का प्रदर्शन करता है। इस नृत्य के साथ पारंपरिक वाद्य चेण्डा का भिन्न-भिन्न लयों यथा तालों में लगातार वादन किया जाता है। वाद्य कलाकार भी पारंपरिक परिधानों में सुसज्जित होकर आते हैं। थैय्यम कलाकार उपस्थित सभी भक्तों को उनके पास जाकर आशीर्वाद देता है तथा उनकी समस्याओं का हल भी बताता है। इस नृत्य अनुष्ठान के दौरान वहां पर उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति एक आध्यात्मिक तथा अद्भुत वातावरण को महसूस करता हुआ बड़ा ही श्रद्धा से इस परम्परा को निष्पादित करता है।

लेखक

डॉ राजेश कुमार चौहान, शिक्षाविद्व


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