हमारी राजभाषा कब बनेगी राष्ट्रभाषा, ‘हिन्द के माथे की बिंदी… हिंदी’

सीमा शर्मा, एप्पल न्यूज़, शिमला

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1918 में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी। उनका कहना था की हिंदी भाषा से किसी भी अन्य भाषा को कोई खतरा नहीं है क्योंकि हिंदी सबकी सहोदर है . इस पर कार्य हुआ और आगे चल कर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद भारत के संविधान ने हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया था। यह निर्णय भारत के संविधान द्वारा स्वीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। अनुच्छेद 343 के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखे गए भारतीय संविधान ने हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया।

हिंदी का इतिहास लगभग 1000 वर्ष पुराना है, परन्तु आधुनिक काल (1850 ईस्वी के पश्चात) में इसमें सबसे अधिक विकास हुआ। यह वह समय था, जब हिंदी भाषा में भारतेंदु और प्रेमचंद जैसे महान सूर्यों का उदय हुआ। इसके साथ भारत के आजादी में भी हिंदी भाषा का काफी महत्व रहा है, चाहे वह आजादी के लिए तैयार किए गये हिंदी नारे हो या फिर देशभक्ति कविताएं सभी ने देश की जनता के ह््रदयों में क्रांति की ज्वाला को भरने का कार्य किया। यही कारण था कि हिंदी को जन-जन की भाषा माना गया और आजादी के पश्चात इसे राजभाषा का दर्जा मिला।

स्वतंत्रता के दो साल बाद नवगठित प्रशासन राष्ट्र के कई सांस्कृतिक भाषाई और कई धार्मिक समूहों को एकजुट करने के लिए सामाजिक दबाव में था। यह भी महत्वपूर्ण था कि पूरे देश को एक साथ रखने में अद्वितीय राष्ट्रीय एकता को बनाए रखा गया। चूंकि भारत में ऐसी कोई भी भाषा नहीं थी जो इसे एक अनूठी राष्ट्रीय पहचान दे सकती थी इसलिए एकीकरण के समाधान के रूप में हिंदी को स्वीकार किया गया। इससे भी ज्यादा यह उत्तर भारत के प्रमुख हिस्सों में बोली जाती है। यह राष्ट्रीय भाषाई एकीकरण के लिए एक स्पष्ट संकल्प था। हालांकि भारत के एक विशाल क्षेत्र में बसे गैर-हिंदी भाषी इस विचार से असंतुष्ट थे। उन्होंने पूरी तरह से हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे सांस्कृतिक बेमेल के कारण इससे सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे थे। जिसकी वजह से एक गैर भारतीय भाषा अंग्रेजी को भी यह दर्जा देना पड़ा। अब दो भाषाएं हैं, हिंदी और अंग्रेजी, जो आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के स्तर पर इस्तेमाल की जाती हैं। जिसकी देन है कि आज हमें हिंदी के उत्थान के लिए हिंदी दिवस मनाना पड़ रहा है। हिंदी के सर्वत्र विकास के लिये हिंदी दिवस मनाया जाता है। ताकि हिंदी को जन-जन तक पहुंचाया जाए और हिंदी को भारत में राष्ट्रभाषा का सम्मान मिल पाए।

हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस सप्ताह को हिंदी पखवाड़ा कहा जाता है। पूरे विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से हिंदी चौथी है। आज़ादी मिलने के बाद, देश मे अंग्रेजी के बढ़ते उपयोग और हिंदी के बहिष्कार को देखते हुए हिंदी दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। जिसके तहत निबंध प्रतियोगिता, भाषण, काव्य गोष्ठी, वाद-विवाद जैसी प्रतियोगिताएं करवाई जाने लगीं, ताकि लोगों में इस भाषा के प्रति रुचि जगे और वे इन प्रतियोगिताओं में भाग लेकर इस भाषा के ज्ञान को बढ़ाएं। साथ ही साथ सभी सरकारी कार्यालयों मे हिंदी विभाग का गठन किया गया जिसका कार्य कार्यालय में सबको हिंदी सिखाना और हिंदी भाषा के महत्व को बढ़ाना है।

यह दिन भारत के हिंदी भाषी राज्यों में उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिंदी दिवस का जश्न भारत सरकार के सभी केंद्रों, कार्यालयों, स्कूलों और सभी संस्थानों में सरकारी वित्त पोषित कार्यक्रम है। इसे मूल रूप से पूरी दुनिया में हिंदी भाषा की संस्कृति को बढ़ावा देने और प्रसार करने के लिए मनाया जाता है।

दुर्भाग्य से ’हिंदी’ भाषा का महत्व धीरे-धीरे नीचे गिर रहा है। जो लोग हिंदी बोलते हैं उन्हें तथाकथित हाई क्लास सोसाइटी द्वारा संदेह की दृष्टि के साथ देखा जाता है। लोग सार्वजनिक स्थानों में हिंदी बोलते वक़्त शर्म महसूस करते हैं। हालांकि यह भी देखा है कि बहुत से शिक्षित लोग हिंदी में बहुत आत्मविश्वास से बातचीत करते हैं। हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है और हमें हमेशा भाषा का जितना संभव हो प्रयोग करते समय गर्व महसूस करना चाहिए। हम एक दूसरे से और अधिक जुड़े हुए महसूस करते हैं जब हम हिंदी में बोलते हैं। इससे वार्तालाप व्यक्तिगत हो जाता है क्योंकि इससे हमारे अंदरूनी विचारों और भावनाओं को व्यक्त करना आसान हो जाता है। वास्तव में अब गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों ने भी हिंदी भाषा को समझना शुरू कर दिया है।

केंद्र सरकार भी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में हिंदी भाषा को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है और हिंदी दिवस समारोह इन प्रयासों का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह देखना बहुत उत्साहजनक है कि हमारी हिंदी भाषा न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता प्राप्त कर रही है।

आजकल लोग अंग्रेजी सीखने के लिए उत्सुक हैं और महसूस करते हैं कि यदि वे हिंदी में बोलते रहे तो यह उनके कैरियर को प्रतिबंध या उनकी प्रगति में बाधाएं उत्पन्न कर सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है लोगों के लिए आगे बढ़ना और अन्य भाषाओं को सीखना महत्वपूर्ण है लेकिन हमारी मातृभाषा के महत्व को भूलना या कम करना, यह सही रास्ता नहीं है जिस पर हम आगे बढ़ते हैं। अन्य भाषाएं भी आवश्यक है लेकिन हमारे भीतर हिंदी भाषा का उत्तराधिकारी होने की जड़ होना बहुत महत्वपूर्ण है।

हमें भारत के नागरिकों के रूप में अपनी मातृभाषा – हिंदी को अन्य भाषाओं और दुनिया के अन्य देशों में मान्यता के महत्व को प्राप्त करने पर ध्यान देना चाहिए। विदेशों में वहां के नागरिकों को पैसे लेकर उन्हें हिंदी सीखने के लिए स्वैच्छिक कक्षाएं लगाई जाती हैं। विभिन्न देशों में हिंदी सीखना नागरिकों के लिए बहुत उत्साही बात है। भारत में फ्रांसीसी, स्पैनिश, आदि सीखते हैं। इसमें अपना करियर बनाना हमारा मकसद है परन्तु विदेश में लोग कैरियर बनाने के मकसद से नहीं बल्कि हिंदी में उनकी रूचि है इसलिए वे हिंदी सीखते हैं। कविता लेखन और कविता सुनाना, कथालेखन और कथा सुनाना, निबंध लेखन और हिंदी शब्दावली की प्रश्न उत्तर आदि के विभिन्न सत्रों को व्यवस्थित किया जा सकता है ताकि अन्य लोगों के साथ युवा पीढ़ी हिंदी भाषा से ज्यादा जुड़ी हो। उम्मीद करते हैं कि हिंदी भाषा और हिंदी दिवस का अविश्वसनीय मूल्य प्रमुखता पर बना रहे।

वर्तमान समय में हम इस बात से इंकार नही कर सकते कि हिंदी के उपर दिन-प्रतिदिन संकट गहराता जा रहा है। तथ्यों और किताबी बातों के लिए यह ठीक है कि हिंदी हमारी राज भाषा है पर इस बात से हम सब वाकिफ है, हममें से ज्यादेतर लोग सामूहिक मंचो और जगहों पर हिंदी बोलने से कतराते है। आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि हमारे अपने ही देश में लोग हिंदी विद्यालयो में अपने बच्चों को दाखिला दिलाने में संकोच महसूस करते है। लोग चाहते कि उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़े और फर्राटेदार अंग्रेजी बोले। जो इस बात को पूर्णतः प्रमाणित करती है कि हिंदी हमारे अपने ही देश में दोयम दर्जे की भाषा बनकर रह गयी है। इस बात को लेकर आचार्य चाणक्य का एक कथन स्मरणीय है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “कोई राष्ट्र तब तक पराजित नहीं होता, जब तक वह अपनी संस्कृति और मूल्यों की रक्षा कर पाता है” . उनका यह कथन वर्तमान भारत के परिदृश्य को बहुत ही अच्छे तरीके से परिभाषित करता है। जिसमें आज हम सभी में अग्रेंजी भाषा और अंग्रेजी तौर तरीके अपनाने की होड़ मची हुई है, जिसके लिए हम अपनी मूल भाषा और रहन-सहन तक को छोड़ने के लिए तैयार हो गये हैं।

हमें यह समझाने का प्रयास करना होगा कि आप अपने बच्चों को अंग्रेजी अवश्य सिखायें पर एक दूसरी भाषा के रुप में ना कि प्राथमिक भाषा के रुप में यह सारी चीजे बचपन से ही करना आवश्यक ताकि बाद में आगे चलकर उन्हें सामूहिक मंचो से हिंदी बोलने में संकोच ना हो। इसके साथ ही लोगो को अपनी इस मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है कि अंग्रेजी ही आधुनिक समाज में सब कुछ है। शिक्षा की भाषा पर, इसके विपरीत शोधों में यह देखा गया है कि मातृ भाषा में बच्चे किसी भी विषय को और अधिक तेजी से सीख पाते है। इस अंग्रेजियत के पीछे कुछ ऐसा भी नही पागल होना चाहिए कि हम अपनी संस्कृति, विचारों और भाषा को ही भूल जायें। यदि अंग्रेजी ही तरक्की का पर्याय होती तो जर्मनी, जापान और इटली जैसे देश इतने विकसित नही होते, जोकि अपनी मातृभाषा को शिक्षा के साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी इतना महत्व देते है।

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