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लवी मेला- सदियों से जीवित व्यापारिक विरासत, “अंतरराष्ट्रीय घोषणा” तो हुई “40 वर्षों से अधिसूचना का इंतजार”

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एप्पल न्यूज, रामपुर बुशहर

हिमाचल प्रदेश अपनी सांस्कृतिक विविधता, मेलों और त्योहारों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहां का हर मेला और त्योहार अपने भीतर ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक महत्व समेटे हुए है।

इन्हीं में से एक है अंतरराष्ट्रीय लवी मेला, जिसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई थी और आज भी यह मेला विश्वभर में अपनी पहचान बनाए हुए है। इस व्यापारिक मेले ने प्रदेश की अर्थव्यवस्था को वर्षों से मजबूती प्रदान की है।

आज मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू इस मेले का विधिवत समापन करेंगे जबकि व्यापार करीब एक माह तक चलता रहेगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और व्यापारिक महत्व

पुराने समय में हिमाचल प्रदेश के ऊनी उत्पाद, पश्मीना, चिलगोजा और अन्य स्थानीय वस्तुओं की देश ही नहीं, विदेशों में भी जबरदस्त मांग रहती थी। उस दौर में बुशहर राज्य के तिब्बत के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध थे।

व्यापार इतना विस्तृत हुआ कि तिब्बत से आने वाले माल की बिक्री के लिए एक बड़े मंच की आवश्यकता महसूस हुई और यहीं से लवी मेले की परंपरा शुरू हुई।

मेले में पारंपरिक रूप से ऊनी कपड़ों, पीतल के बर्तनों, औजारों, बिस्तरों, मेवों, शहद, सेब, चिलगोजा, सूखी खुमानी, अखरोट, ऊन और पशम का बड़ा व्यापार होता आया है। आज भी हर साल यहां अरबों रुपए का कारोबार होता है।

लवी नाम की उत्पत्ति

‘लवी’ नाम की उत्पत्ति ‘लोइया’ शब्द से हुई है। पहाड़ी क्षेत्रों में पहना जाने वाला परंपरागत ऊनी कोट लोइया कहलाता है। माना जाता है कि मध्यकाल में बुशहर रियासत के राजा केहरी सिंह के शासनकाल में यह मेला शुरू हुआ।

उस समय तिब्बत और अफगानिस्तान के व्यापारी सूखा मेवा, ऊन और पशम लेकर रामपुर आते थे और बदले में नमक, गुड़ और अन्य जरूरी सामान खरीदकर ले जाते थे।

समय के साथ मेले का स्वरूप बदल गया है। अब तिब्बत और अफगानिस्तान से व्यापारी नहीं आते, लेकिन किन्नौर, पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों के व्यापारी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

मेले में सांस्कृतिक संध्याएं भी प्रमुख आकर्षण रहती हैं, जिनमें हिमाचली कलाकारों के साथ बॉलीवुड गायक भी प्रस्तुति देते हैं।

1985 में हुई अंतरराष्ट्रीय दर्जा देने की घोषणा

सैकड़ों वर्षों पुराने इस मेले को वर्ष 1985 में अंतरराष्ट्रीय मेला घोषित किया गया। 1983 में पहली बार मुख्यमंत्री बने वीरभद्र सिंह ने इसे अंतरराष्ट्रीय दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तब से अब तक मेला अपनी भव्यता और परंपरा को मजबूती से संजोए हुए है।

विडंबना ये रही कि वीरभद्र सिंह इस घोषणा के बाद 5 बार मुख्यमंत्री बने, 3 बार केंद्रीय मंत्री भी रहे लेकिन मेले की अधिसूचना जारी नहीं हुई। आज 40 साल बीत गए इस बीच शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल, जयराम ठाकुर और अब सुखविंद्र सिंह सुक्खू मुख्यमंत्री बन चुके है लेकिन अंतरराष्ट्रीय दर्जे की अधिसूचना जारी नहीं हुई।

रामपुर बुशहर से 7 बार कांग्रेस से सिंघी राम विधायक रहे और 3 बार नंद लाल बन चुके हैं लेकिन इस मेले के स्तर को बढ़ाने के बजाय निम्न करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही। अति महंगे प्लॉट, महंगा सामान, बड़े कलाकारों का न आना, बुशहरी मार्किट के लिए स्थान न देना और परंपरा के विपरीत कबाड़ को ज्यादा महत्व देना जैसे मुद्दों से इसका स्तर घटता ही जा रहा है। जिस पर लोग लगातार सवाल उठा रहे है।

सरकार केi अधिसूचना के अनुसार हिमाचल के केवल 4 मेले कुल्लू दशहरा, मंडी शिवरात्रि,सिरमौर का श्री रेणुका जी और चम्बा का मिंजर मेला ही अंतरराष्ट्रीय का दर्जा प्राप्त है तो फिर लवी मेले में अंतरराष्ट्रीय लिखकर क्यों जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है, ये बड़ा सवाल है।

2025 का आयोजन और गतिविधियां

इस वर्ष भी लवी मेला 11 से 14 नवंबर तक आयोजित किया गया। राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने मेले का विधिवत शुभारंभ किया और विभिन्न विभागों की प्रदर्शनियों का अवलोकन किया। आधिकारिक रूप से मेला चार दिन का है, लेकिन रामपुर में व्यापारिक गतिविधियां एक महीने तक जारी रहती हैं।

आज मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू मेले के समापन समारोह में हिस्सा लेंगे। अपने रामपुर प्रवास के दौरान वे कई योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन भी करेंगे।

व्यापार में उत्साह और चुनौतियां

मेले की शुरुआत के साथ ही किन्नौरी मार्केट में भारी भीड़ उमड़ रही है। किन्नौरी पट्टू, शॉल, मफलर, लिंगचा, दोहडू और अन्य पारंपरिक वस्त्र इस बार भी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

हालांकि, इस बार व्यापारियों को महंगाई और ऑनलाइन शॉपिंग की मार का सामना भी करना पड़ रहा है, जिससे कुछ हद तक निराशा देखी जा रही है। इसके बावजूद लवी मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए आज भी वरदान साबित हो रहा है।

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